MP board 12th Chemistry Question Paper 2022 Solution- कक्षा 12वीं रसायन विज्ञान वार्षिक पेपर 2022

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MP board 12th Chemistry Question Paper 2022 Solution: कक्षा 12वीं रसायन विज्ञान वार्षिक पेपर (12th Chemistry varshi Paper) की बेहतर तैयारी और अच्छे परीक्षा परिणाम के लिए हम लाए हैं class 12th के सभी विषयो के impotant solution जो पूर्णतया blueprint पर आधारित है तथा इसमें reduce syllabus को भी ध्यान में रखा गया है।

MP board 12th Chemistry Question Paper 2022 Solution- कक्षा 12वीं रसायन विज्ञान वार्षिक पेपर 2022
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आज की इस पोस्ट में हम आपको chemistry( रसायन शास्त्र ) की unit 8 (d एवं f ब्लॉक के तत्व) का important solution उपलब्ध कर रहे हैं। लाभ लेने के लिए इसे पूरा अवश्य पढ़ें।

यदि आपने यूनिट 1 , 2, 3,4,5,6,7 का important solution नहीं देखा है तो नीचे दी हुई लिंक पर जाकर आप इसे विजिट कर सकते हैं।

MP board Chemistry unit – 2 (विलयन) important solution Class 12th

MP board 12th केमिस्ट्री त्रिमासिक पेपर 2021-22 IMP Solution PDF download

MP board 12th Chemistry Question Paper 2022 IMP Solution- कक्षा 12वीं रसायन विज्ञान वार्षिक पेपर के लिए हल

इस यूनिट से आपके प्रश्न पत्र में 5 अंकों का एक प्रश्न आएगा अर्थात यह यूनिट आपको पूरे 5 अंक प्रदान कर सकती है।

UNIT – Viii
Chepter – 8
d तथा f ब्लॉक के तत्व

प्रश्न 1. संक्रमण तत्वों की छः विशेषताएँ लिखिए।

अथवा

संक्रमण तत्वों के चार अभिलाक्षणिक गुण लिखिए।

उत्तर- संक्रमण तत्व निम्नलिखित विशिष्ट गुण प्रदर्शित करते हैं:

(1) सभी संक्रमण तत्व धात्विक प्रकृति के होते हैं तथा मजबूत व कठोर होते हैं।

(2) इनके गलनांक व क्वथनांक उच्च होते हैं।

(3) ये ऊष्मा और विद्युत् के सुचालक होते हैं।

(4) ये परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं।

(5) ये रंगीन आयन बनाते हैं, एवं प्राय: अनुचुम्बकीय (paramagnetic) होते हैं।

(6) ये उपसहसंयोजी संकुल बनाते हैं।

(7) ये परस्पर तथा अन्य धातुओं के साथ मिश्र धातु (alloy) बनाते हैं।

प्रश्न 2. संक्रमण तत्व और उनके अनेक यौगिक अनुचुम्बकीय व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। इसका कारण दीजिए तथा स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-संक्रमण तत्वों का अनुचुम्बकीय (Paramagnetic) लक्षण-संक्रमण तत्व और उनसे बने यौगिक अनुचुम्बकीय व्यवहार इसलिए प्रदर्शित करते हैं, क्योंकि इनके (n-1) उपकोश में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं। ये अयुग्मित इलेक्ट्रॉन अपनी कक्षीय (orbital) तथा चक्रण (spin) गति के कारण चुम्बकीय आघूर्ण उत्पन्न करते हैं जिससे ये चुम्बकीय क्षेत्र से आकर्षित होते हैं। अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या जितनी अधिक होती है अनुचुम्बकीय लक्षण उतना अधिक होता है जिसके कारण चुम्बकीय आघूर्ण का मान भी उतना उच्च होता है। अनुचुम्बकीय लक्षण Sc2+ से Mn-* तक धीरे-धीरे बढ़ता है और फिर क्रमश: घटता है। चुम्बकीय आघूर्ण का मान निम्नलिखित सूत्र के द्वारा परिकलित किया जा सकता है :

μ= √n(n+2)

जहाँ । परमाणु या आयन में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है। इस आधार पर Sc* आयन (34°) में चुम्बकीय आघूर्ण शून्य होगा और T3+ आयन (3d’) में!/1(1+2) =1-73 बोर मैग्नेटॉन होगा।

प्रश्न 3.d-ब्लॉक के तत्व (संक्रमण तत्व) रंगीन आयन बनाते हैं, क्यों ?

उत्तर-अधिकांश संक्रमण धातु आयन एवं उनके यौगिक ठोस अवस्था और जलीय विलयन दोनों में संगीन होते हैं। यह गुण उनमें उपान्तिम (n-1)d उपकोश में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति के कारण होता है। इन धातु आयनों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन प्रोन्नत (promote) होकर एक ही उपकोश (d) में एक ऊर्जा स्तर से दूसरी ऊँची ऊर्जा स्तर (रिक्त 4-कक्षक) में चले जाते हैं। इलेक्ट्रॉनों को एक ऊर्जा स्तर से दूसरी ऊर्जा स्तर पर प्रोन्नत होने के लिए आवश्यक ऊर्जा दृश्य प्रकाश (visible light) के किसी अवयव से प्राप्त होती है। इसलिए जब संक्रमण तत्वों के किसी यौगिक को ठोस अथवा विलयन की अवस्था में श्वेत प्रकाश (या दृश्य प्रकाश) में रखते हैं तो यह श्वेत प्रकाश से उसके किसी अवयवी रंग के समतुल्य ऊर्जा को अवशोषित कर लेता है जिससे अयुग्मित d-इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उसी उपकोश में किसी रिक्त -कक्षक में चले जाते हैं (d-d संक्रमण)। श्वेत प्रकाश के शेष रंग पारगत (transmitted) हो जाते हैं और यौगिक रंगीन दिखायी पड़ता है।

प्रश्न 4. संक्रमण धातुओं में संकुल यौगिक बनाने की प्रवृत्ति होती है। समझाइए।

उत्तर-संक्रमण तत्वों द्वारा संकुल निर्माण इसलिए होता है, क्योंकि इनके परमाणु या आयन में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं :

(1) संक्रमण धातु आयन का आकार बहुत छोटा व धनावेश अधिक होता है, फलस्वरूप इन पर धनावेश घनत्व अधिक होता है, जोकि लिगण्ड से इलेक्ट्रॉन युग्म को ग्रहण करने के लिए उत्तरदायी होता है।

(2) इनमें उपयुक्त ऊर्जा वाले रिक्त d-ऑर्बिटल उपलब्ध रहते हैं, जोकि लिगण्ड से उप-सहसंयोजक बन्धों के द्वारा इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर सकते हैं।

प्रश्न 5. संक्रमण धातु परिवर्तनशील संयोजकता दर्शाती हैं, क्यों ?

अथवा

संक्रमण धातुएँ परिवर्तनीय ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाती हैं, क्यों ?

उत्तर-संक्रमण तत्वों में ns और (n-1) dआर्बिटलों की ऊर्जा में अन्तर बहुत कम होता है इसलिये इनमें इलेक्ट्रॉनों के अतिरिक्त (n-1)d ऑर्बिटल के इलेक्ट्रॉन भी रासायनिक बन्ध के बनाने में भाग ले सकते है। इसलिए ये तत्व परिवर्ती संयोजकता या परिवर्तनीय ऑक्सीकरण अवस्थायें प्रदर्शित करते हैं। जैसे-Fe दो तथा तीन संयोजकताएँ दर्शाती है।

Fe^2 + 1s^2 ………3d^6

Fe3+1s^2 ………3d^5

प्रश्न 6. लेन्थेनाइड संकुचन से आप क्या समझते हो? इसके क्या परिणाम होते हैं?

अथवा

सैन्थेनाइड संकुचन का क्या कारण है ?

उत्तर- लैन्थेनाइड संकुचन-सामान्यत: – (n-1)d इलेक्ट्रॉन, परिधि के इलेक्ट्रॉनों को नाभिकीय आकर्षण परिरक्षित करते हैं (screening effect) जिससे परमाणु क्रमांक में वृद्धि के साथ-साथ परमाणु त्रिज्या में कमी होती है, किन्तु लैन्थेनाइडों में परमाणु क्रमांक में वृद्धि के साथ परमाणु त्रिज्याएँ तथा आयनिक त्रिज्या नियमित रूप से घटती हैं, इसे लैन्थेनाइड संकुचन कहते हैं। इसका कारण यह है कि लैन्थेनाइडों में समानुक्रमांक में वृद्धि (नाभिक में प्रोटॉन वृद्धि) के साथ अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन 4f-ऑर्बिटल से प्रवेश करते हैं। 4f-ऑर्बिटल की आकृति ऐसी होती है कि इसका नाभिक और बाह्य कोश के इलेक्ट्रॉनों के बीच परिरक्षण प्रभाव (Screening effect) न्यूनतम होता है। अत: जैसे-जैसे परमाणु संख्या में वृद्धि होती है नाभिकीय आकर्षण तो बढ़ता किन्तु उसे सन्तुलित करने वाला परिक्षण प्रभाव उतना नहीं बढ़ता है जिसके कारण लैन्थेनाइडों के परमाण्वीय आकर में एक क्रमिक कमी आती जाती है। इसे लैन्थेनाइड संकुचन (Lanthanide contraction) कहते हैं।

उदाहरणार्थ, परमाण्वीय त्रिज्या 1.67 A° (La) से 1.557 A°(Lu) तक तथा आयनिक त्रिज्या 1.06 A° (La3+) से 0.848 A° (Lu3+) तक क्रमशः घटती है।

प्रश्न 7. प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्वों में निम्नलिखित गुणों के परिवर्तन (variation) की विवेचना कीजिए:

(1) परमाण्वीय त्रिज्या,

(3) धात्विक लक्षण,

(2) आयनन ऊर्जा,

(4) ऑक्सीकरण अवस्थाएँ।

अथवा

संक्रमण तत्व विविध ऑक्सीकरण अवस्था क्यों दर्शाते हैं ?

उत्तर- प्रथम संक्रमण श्रेणी Sc (21) से प्रारम्भ होकर Zn (30) पर समाप्त होती है।

(1) परमाण्विक त्रिज्या- संक्रमण तत्वों की परमाण्वीय त्रिज्याएँ s- तथा p- समुदय केे तत्वों केे मध्य होती है। किसी संक्रमण श्रेणी में बायें से दायें चलने से परमाणु क्रमांक में वृद्धि पर परमाण्वीय त्रिज्या घटती है। प्रारम्भ में यह कमी शीघ्रता से होती है और फिर बहुत धीरे-धीरे तत्व परमाण्विक

Sc Ti V Cr Mn Fe Co Ni Cu Zn

त्रिज्या (pm)

144 132 122 117 117 117 116 115 117 123

प्रारम्भ में नाभिकीय आवेश में वृद्धि के कारण परमाणु त्रिज्या घटती है, किन्तु बाद में बढ़े हुए नाभिक आवेश का प्रभाव उपान्तिम (penultimate) कोश के d-ऑर्बिटलों के इलेक्ट्रॉनों के बढ़े हुए आवरण प्रभाव (screening effect) द्वारा आंशिक रूप से निरस्त हो जाता है। इस कारण परमाण्विक त्रिज्या (atomic radii) लगभग स्थिर हो जाती है।

(2) आयनन ऊर्जा– संक्रमण तत्वों की प्रथम आयनन ऊर्जा -ब्लॉक के तत्वों की आयनन ऊर्जा का तुलना में उच्च, किन्तु p-ब्लॉक के तत्वों से कम होती है। किसी संक्रमण श्रेणी में बायें से दायें चलने आयनन ऊर्जा का मान धीरे-धीरे बढ़ता है। आयनन ऊर्जा में वृद्धि नाभिकीय आवेश में वृद्धि के कारण होती। किन्तु यह वृद्धि धीरे-धीरे होती है, क्योंकि नाभिकीय आवेश में वृद्धि का प्रभाव परिरक्षण प्रभाव (screens effect) में वृद्धि के कारण आंशिक रूप से निरस्त हो जाता है।

(3) धात्विक लक्षण- संक्रमण तत्व धात्विक प्रकृति के होते हैं। ये कटोर, उच्च घनत्व वाले तथा ऊष्मा व विद्युत् के उच्च चालकता वाले होते हैं और इनमें विशिष्ट धात्विक चमक होती है। इनमें धात्विक लक्षण निम्न आयनन ऊर्जा और रिक्त d-ऑर्बिटलों के कारण होता है।

(4) ऑक्सीकरण अवस्थाएँ- संक्रमण धातुएँ परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ अर्थात् कई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करती हैं। इसका कारण यह है कि इन धातुओं के -ऑर्बिटलों के इलेक्ट्रॉनों के अतिरित (n-1) d-ऑर्बिटलों के कुछ या सभी इलेक्ट्रॉन भी रासायनिक बन्ध बनाने में भाग ले सकते हैं, क्योंकि इससे ns और (n-1) d-इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जाओं में बहुत कम अन्तर होता है। प्रथम श्रेणी (34) के संक्रमण तत्वों के द्वारा प्रदर्शित विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाएँ अग्रांकित सारणी में दी गयी हैं :

प्रश्न 8. लैंथेनाइड तथा एक्टिनाइड मैं अंतर लिखिए।

उत्तर-

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प्रश्न 9. लैन्थेनाइड संकुचन से आप क्या समझते हो ? इसके क्या परिणाम होते हैं ?

अथवा

लैन्थेनाइड संकुचन का क्या कारण है ?

उत्तर–लैन्थेनाइड संकुचन-सामान्यतः (n-1) d इलेक्ट्रॉन, परिधि के इलेक्ट्रॉनों को नाभिकीय आकर्षण से परिरक्षित करते हैं (screening effect) जिससे परमाणु क्रमांक में वृद्धि के साथ-साथ परमाणु त्रिज्या में बहुत कम कमी होती है, किन्तु लैन्थेनाइडों में परमाणु क्रमांक में वृद्धि के साथ परमाणु त्रिज्याएँ तथा आयनिक त्रिज्याएँ नियमित रूप से घटती हैं, इसे लैन्थेनाइड संकुचन कहते हैं। इसका कारण यह है कि लैन्थेनाइडों में परमाणु क्रमांक में वृद्धि (नाभिक में प्रोटॉन वृद्धि) के साथ अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन 4f-ऑर्बिटल से प्रवेश करते हैं।4 f ऑर्बिटल की आकृति ऐसी होती है कि इसका नाभिक और बाह्य कोश के इलेक्ट्रॉनों के बीच परिरक्षण प्रभाव (screening effect) न्यूनतम होता है। अत: जैसे-जैसे परमाणु संख्या में वृद्धि होती है नाभिकीय आकर्षण तो बढ़ता है, किन्तु उसे सन्तुलित करने वाला परिरक्षण प्रभाव उतना नहीं बढ़ता है जिसके कारण लैन्थेनाइडों के परमाण्वीय आकार में एक क्रमिक कमी आती जाती है। इसे लैन्थेनाइड संकुचन (Lanthanide contraction) कहते हैं।

उदाहरणार्थ, परमाण्वीय त्रिज्या 1.67Å (La) से 1.557 Å(Lu) तक तथा आयनिक त्रिज्या 1.06 Å (La”) से 0.848 Å (Lu3) तक क्रमश: घटती है।

प्रश्न 10. ऐक्टिनाइड क्या होते हैं ? इनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास दीजिए। इनके द्वारा प्रदर्शित मुख्य ऑक्सीकरण अवस्थाओं का उल्लेख कीजिए।

अथवा

ऐक्टिनाइड क्या होते हैं ? इनके द्वारा प्रदर्शित मुख्य ऑक्सीकरण अवस्थाएँ बताइए।

उत्तर-ऐक्टिनियम से लारेन्सियम (90-103) तक के तत्वों को ऐक्टिनाइड कहते हैं तथा ऐक्टिनियम (89) का बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास Sydod.7 होता है। इसके बाद के 14 तत्वों में क्रमानुसार 14 इलेक्ट्रॉन रिक्त ऑर्बिटल में भरते हैं। कि इन तत्वों के बाह्यतम और उपान्तिम (penultimate) कोशों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान रहती है, इसलिए सभी ऐक्टिनाइड एक-दूसरे से गुणों में बहुत समानता रखते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास-ऐक्टिनियम (39) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Rn] 6d75 है। थोरियम (Z =90) से आगे 5f उपकोश क्रम से पूरित होता है। 5 तथा 6d उपकोशों की ऊर्जा समान होती है, इसलिए 5f और 6d उपकोशों के पूरित होने के क्रम में सन्देह है। उदाहरणार्थ, यह निश्चितता से नहीं कहा जा सकता है कि थोरियम में कोई 5 f ईलेक्ट्रॉन है या नहीं। दो सम्भावनाएँ हैं, जैसे-[Rn]5f6d-7s- अथवा [Rn] 5f6d17s1

ऐक्टिनाइडों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास अग्रांकित सारणी में दिया गया है

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ऑक्सीकरण अवस्था-ऐक्टिनाइडों की मुख्य ऑक्सीकरण अवस्था +3 होती है। इसके अतिरिक्त ये +2, +4.+5 और + 6 ऑक्सीकरण अवस्था भी प्रकट करते हैं। लैन्थेनाइडों की अपेक्षा ऐक्टिनाइड श्रेणी के तत्वों से वृहत् समानता प्रदर्शित करते हैं। जैसे–थोरियम +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है और के प्रारम्भ के प्रत्येक सदस्यों की अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ होती हैं। इनमें से कुछ तत्व संक्रमण उसका व्यवहार चतुर्थ समूह के तत्वों के समान होता है। इसी प्रकार यूरेनियम+6 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शिता करता है और यह बहुत से गणों में षष्टम समूह के तत्वों से मिलता-जुलता है। परमाणु क्रमांक में वृद्धि के साथ ऐक्टिनाइडों में + 3 ऑक्सीकरण अवस्था अधिकाधिक स्थायी होती जाती है। अधिकांश ऐक्टिनाइड आयन रंगीन होते हैं; जैसे-U(IV), U(III) तथा UO,” लवण क्रमशः हरे, लाल तथा पीले होते हैं। अनेक ऐक्टिनाइड आयन अनुचुम्बकीय होते हैं।
Note― दोस्तों हमारी पोस्ट को पूरा पढ़कर अपनी तैयारी बनाये और बेहतर साथ ही इसे अपने दोस्तों से भी शेयर करे तथा सभी solution पाने के लिए हमारी वेबसाइट को विजिट करते रहें।हमारे साथ बने रहने के लिए धन्यवाद……

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