12th फसल उत्पादन त्रिमासिक पेपर 2021-22 MP board | Full Solution

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12th फसल उत्पादन त्रिमासिक पेपर 2021-22 MP board | Full Solution

Mp board 12th cropoduction  trimasik pepar 2021-22 :- दोस्तों आज हम आपके लिए क्लास 12th फसल उत्पादन के त्रिमासिक  परीक्षा के लिए most important question बताने वाले हैं solution के साथ यदि आपको समझ नहीं आ रहा है कि आप अपनी त्रिमासिक परीक्षा की तैयारी किस प्रकार करें, कौन-कौन से क्वेश्चन  इंपोर्टेंट है और आप गूगल पर इंपॉर्टेंट क्वेश्चन सर्च कर रहे हैं तो आप बिल्कुल सही जगह पर आ गए हैं क्योंकि आज हम आपको इस पोस्ट में त्रिमासिक परीक्षाओं के लिए most important question बताने वाले हैं जो आपकी त्रिमासिक और वार्षिक दोनों परीक्षाओं की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है।।

Class 12th फसल उत्पादन त्रिमासिक पेपर syllabus:―

त्रिमासिक परीक्षाओं के आते ही सभी बच्चों के मन में एक ही प्रश्न होता है कि हमारी परीक्षाओं में कितना सिलेबस आएगा आपकी त्रि-मासिक परीक्षाओं में कुल सिलेबस का 33% सिलेबस पूछा जाता है जिसमें आप से किन-किन अध्याय से प्रश्न पूछे जाएंगे आपके इस सवाल का स्पष्ट करने के लिए यहां पर  त्रिमासिक परीक्षा के लिए  fasal utpann syllabus उपलब्ध है जो कि इस प्रकार है―


Cropoductin

 important question

Chapter – 1
जल निकास

प्रश्न 1.- जल निकास को परिभाषित कीजिए ।

उत्तर-  अनावश्यक जल को खेतों में से बाहर निकालना जल निकास कहलाता है।

प्रश्न 2-  जल निकास   गुणांक को परिभाषित कीजिए ।

उत्तर-  किसी भी ज्ञात क्षेत्रफल से 24 घंटे में जितनी पानी का निकास प्रति इकाई क्षेत्रफल होता है उसे जल निकास गुणांक(Drainge cofficient)  कहते हैं।

प्रश्न 3- भूमिगत जल निकास की कोई दो हानियां लिखिए ।

उत्तर- 1. भूमि गत जल निकास मे लागत अधिक आती है तथा धन व समय अधिक खर्च होता है ।

2.  इससे  भूमि का जल स्तर नीचे हो जाता है।

प्रश्न 4- पृष्ठीय एवं भूमिगत जल निकास नालियों में अंतर स्पष्ट कीजिए

 उत्तर-          पृष्ठीय जल निकास नालियाँ

1.  पृष्ठीय जल निकास नालियों से खेत के अन्दर कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल कम हो जाता है क्योंकि खेत का कुछ भाग इन नालियों द्वारा घेर लिया जाता है।जबकि भूमिगत जल निकास से कृषि योग्य भूमि के क्षेत्रफल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

2 . इसमें नालियों के निर्माण की प्रारम्भिक लागत कम आती है। जबकि भूमिगत जलनिकास में  प्रारम्भिक लागत अधिक आती है।

3. इसमें खेत की ऊपरी सतह पर नालियाँ होने के कारण कृषि कार्यों में बाधा होती है । जबकि कृषि कार्यों में कोई रुकावट नहीं होती है।

4. इन नालियों की मरम्मत में समय व धन कम लगता है। जबकि भूमिगत जल निकास  में धन व समय अधिक लगता है।

5. इनसे भूमि के जल स्तर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जबकि भूमिगत जल निकास से भूमि का जल स्तर नीचा हो जाता है।

6. इसमें मिट्टी की भौतिक दशा पर कोई प्रभाव नहीं होता। जबकि भूमिगत जल निकास में मिट्टी की भौतिक दशा सुधरती है।

7. भूमि की ऊपरी सतह पर लवण एकत्र हो सकते हैं। जबकि भूमगत जल निकास से हानिकारक लवण एकत्र नहीं हो पाते।

8. इनके द्वारा जल निकास सुगमतापूर्वक होता है। जबकि भूमिगत जल निकास द्वारा जल निकास इतनी  में सुगमता नहीं होता है।

9.इनके द्वारा जल निकास में मृदा क्षरण की अधिक सम्भावना रहती है जबकि  इसमे मृदा क्षरण की कम सम्भावना रहती है।

10. भोज्य तत्वों का निक्षालन (Leaching) ) द्वारा ह्रास नहीं होता है। जबकि भोज्य तत्व इन नालियों से निक्षालन के द्वारा बह जाते हैं।

Chapter-2
पादप पोषण

प्रश्न 1- पादप पोषण किसे कहते हैं 

उत्तर- “वह विधि जिसके द्वारा पौधे अपनी वृद्धि एवं परिवर्द्धन हेतु खनिज तत्वों का अवशोषण तथा उपयोग करते हैं, खनिज पोषण अथवा पादप पोषण कहलाती है।”

प्रश्न 2- हाइड्रोपोनिक्स क्या है

उत्तर- हाइड्रोपोनिक्स (Hydroponics) ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ “जल के साथ कार्य करना” (Working with water) है। अत: पौधों को उगाने की ये सभी विधियाँ जिनमें मृदा के अतिरिक्त किसी अन्य माध्यम का प्रयोग किया जाता है, हाइड्रोपोनिक्स अथवा जल संवर्धन कहलाती है। 

प्रश्न 3- पौधों में आयरन की दो कार्य लिखिए।

उत्तर- आयरन (Iron ‘Fe’)-  पौधे में इसकी मात्रा 10-100 ppm तक होती है। इसका अवशोषण फेरस (Fe24) तथा फेरिक (Fes) दोनों रूपों में किया जाता है।

कार्यिकीय भूमिका (Physiological role)-

(1) यह अनेक ऑक्सीकारक-अपचयन अभिक्रियाओं में प्रयुक्त एन्जाइमों का सक्रिय कारक है।

(2) यह क्लोरोफिल के संश्लेषण में उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है।

प्रश्न 4. पौधों में नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस की कमी से होने वाले दो-दो लक्षण लिखिए।

उत्तर– नाइट्रोजन की कमी के लक्षण (Deficiency symptoms)-

(1) पौधे की वृद्धि प्रभावित होती है।

(2) क्लोरोफिल के निर्माण में कमी आ जाती है तथा पत्तियों का रंग पीला हो जाता है।

(3) इसकी कमी से एन्थोसायनिन (anthocyanin) नामक रंगद्रव्य बनता है।

फास्फोरस की कमी के लक्षण (Deficiency symptoms)-

(1) जड़ एवं तने छोटे एवं कमजोर हो जाते हैं।

(2) पत्तियों तथा फलों में ऊतकक्षय (Necrotic) क्षेत्र बन जाते हैं।

(3) कैम्बियम की सक्रियता कम हो जाती है।

प्रश्न 4. एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन प्रणाली का परिचय एवं महत्त्व बताइए।

उत्तर-        एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन प्रणाली
    [Integrated Nutrien Management System]

“एकीकृत (समन्वित) पोषक तत्व प्रबन्धन प्रणाली के अन्तर्गत पोषक तत्वों के प्रमुख अकार्बनिक व कार्बनिक स्रोतों का कुशलतापूर्वक इस प्रकार समन्वित प्रयोग किया जाता है।जिससे फसल उत्पादन की दक्षता में वृद्धि हो सके तथा मृदा स्वस्थ एवं उत्तम रहे व पर्यावरण भी सुरक्षित रहे।”इसके अन्तर्गत रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग कम-से-कम किया जाता है तथा उनके साथ कार्बनिक एवं जैव-उर्वरकों का प्रयोग अधिक-से-अधिक किया जाता है जिससे मृदा की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य मृदा उर्वरता को संरक्षित कर लम्बे समय तक टिकाऊ फसल उत्पादन बनाये रखना है ताकि आने वाली पीढ़ियों को लगातार खाद्यान्न उपलब्ध होता रहे। एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन का कार्य अत्यन्त व्यापक है, इसमें मृदा के कणों के बीच पोषक तत्वों के चक्र, उर्वरकों का सन्तुलित प्रयोग, कार्बनिक एवं रासायनिक उर्वरकों का समन्वित प्रयोग, जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण आदि सम्मिलित है।

एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन प्रणाली का महत्त्व (Importance of Integrated Nutrient Management System)

टिकाऊ फसल उत्पादन की प्राप्ति के लिए एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन प्रणाली अपनाना आज की आवश्यकता है। पोषक तत्वों के सभी घटकों (स्रोतों) का समन्वित प्रयोगbकरके ही हम अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए खाद्य उत्पादन जुटा सकेंगे एवं मृदा की उर्वरा शक्ति एवं पारिस्थितिक तन्त्र को सुरक्षित रख सकेंगे। एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन परRरलBणाली के अनेक लाभ हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं-

(i) मृदा उत्पादकता में वृद्धि करना।

(ii) मृदा में पोषक तत्वों का असन्तुलन दूर करना।

(iii) मृदा में पोषक तत्वों की सुलभता में वृद्धि करना।

(iv) सूक्ष्म जैविक क्रियाओं में वृद्धि करना।

(v) रासायनिक उर्वरकों के उपयोग क्षमता में वृद्धि करना।

(vi) शुद्ध आर्थिक लाभ में वृद्धि करना।

Chapter -3

खाद

प्रश्न 1 – FYM का पूरा नाम लिखे ।

उत्तर – FYM – Farm Yard Manur.

प्रश्न 2.नासडेप कंपोस्ट विधि किसने विकसित की।

उत्तर-नाडेप कम्पोस्ट विधि (NADEP Composting)-यह विधि महाराष्ट्र के एक साधारण किसान श्री नारायण देवराव पण्दरी पाण्डे (नाडेप काका) ने विकसित की है।

प्रश्न 3 वर्मी कम्पोस्ट क्या है वर्मी कंपोस्ट का महत्व बताइए

उत्तर- वर्मी कम्पोस्ट विधि (Wormi Composting)-वर्मी कम्पोस्ट केंचुओं द्वारा कार्बनिक पदार्थों से खाद बनाने की प्रक्रिया है। केंचुए कार्बनिक पदार्थों (जैसे-घरेलू कचरा, शहरी कचरा, कृषि अवशेष, औद्योगिक अवशेष आदि एवं मृदा को खाते हैं। खाए हुए कार्बनिक पदार्थों का आहार नाल में पहुँचकर पाचन हो जाता है तथा शेष पदार्थ मल के रूप में उत्सर्जित कर दिये जाते हैं। केंचुए द्वारा उत्सर्जित इन पदार्थों को ही वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद) कहते हैं। इसमें केंचुओं की पुरीष (Castings), अवशेष मल, अण्डे, कोकून (Cocoon), लाभप्रद सूक्ष्मजीवाणु आदि का मिश्रण सम्मिलित रहता है। इसके अतिरिक्त इसमें पौधों के लिए आवश्यक दीर्घ एवं सूक्ष्म तत्व, विटामिन एवं वृद्धि हॉर्मोन (ऑक्सिन) पाये जाते हैं। वर्मी कम्पोस्ट में औसत रूप से गोबर की खाद की तुलना में बहुत अधिक मात्रा में पोषक तत्व पाये जाते हैं। इसमें 1.6% नाइट्रोजन, 5-04% फॉस्फोरिक अम्ल, 0.8% पोटाश पाया जाता है। वर्मी कम्पोस्ट का सी/एन अनुपात 1:6 होता है।

वर्मी कम्पोस्ट का महत्त्व 

(Significance of Wormi Compost)

(1) गोबर की खाद के मुकाबले इसकी गुणवत्ता 8-10 गुना ज्यादा होती है।

(2) इसमें काफी नमी होने की वजह से सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों से पौधे को आवश्यक पोषाक तत्वों को प्राप्त होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

(3) वर्मी कम्पोस्ट के कण मृदा के कणों के साथ मिलकर मृदा की जल धारण क्षमत (Water holding capacity) को बढ़ा देते हैं।

(4) वर्मी कम्पोस्ट एक शुद्ध प्राकृतिक खाद है और इसका कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पाया जाता है। अत: यह पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने में सहायक है।

(5) यह खाद टिकाऊ खेती के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।

(6) इसका उपयोग कृषि रसायनों द्वारा उत्पन्न समस्या के निराकरण हेतु किया जा सकता है।

(7) भूमि में जीवांश वृद्धि के फलस्वरूप वायु संचार में सुधार होता है।

(8) पौधों में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है जिससे कीट एवं रोगों का प्रभाव कम होता है।

प्रश्न 4 जैविक खाद क्या है ।

उत्तरप्राकृतिक या जैविक खाद (Organic Manures)― वे खादें जिनके द्वारा मृदा में जैविक पदार्थों (जीवांश) की पूर्ति होती है, उन्हें ‘जैविक खाद’ कहते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से खाद’ में प्राकृतिक पदार्थ, जैसे-घास, हरे पौधे, पशुत्र के मलमूत्र व अन्य अवशेष सम्मिलित हैं। मृदा में ये प्राकृतिक पदार्थ विभिन्न रूपों और अवस्थाओंभवमें विद्यमान रहते हैं। इनके अन्दर पौधे के सभी आवश्यक तत्व कम या अधिक मात्रा में उपस्थित रहते हैं। इस वर्ग में गोबर की खाद, कम्पोस्ट व हरी खाद आदि शामिल करते हैं।

प्रश्न 5  पूर्ण खाद क्या है ?

उत्तर- पूर्ण खाद (Complete Manures)-  इस वर्ग में वे सभी कार्बनिक खादें सम्मिलित हैं जिनमें पौधे के सभी आवश्यक तत्व थोड़ी-बहुत मात्रा में पाये जाते हैं। पूर्ण खाद कारखानों में भी तैयार की जा सकती है। ग्वानो भी एक पूर्ण खाद है

प्रश्न 6  हरी खाद क्या है इसके महत्व का वर्णन कीजिए

उत्तर – परिभाषा (Definition)-हरी खाद को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है-“हरी खाद से तात्पर्य उन फसलों को जोतकर भूमि में दबाकर सड़ाने से है, जो भूमि के लिए आवश्यक उर्वरक तत्व प्रदान कर सकें तथा भूमि की दशा सुधार सकें।”

अथवा

“हरी खाद वह खाद है जो भूमि में जीवांश पदार्थ तथा उर्वरता में वृद्धि करने वाली फसल को हरी अवस्था में दबाने से प्राप्त होती है।”

अथवा

“भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए दलहनी तथा अदलहनी फसलों को उगाकर हरी अवस्था में ही भूमि में जोतकर सड़ाने के फलस्वरूप जो खाद बनती है, उसे हरी खाद कहते हैं।

हरी खाद के लाभ (Advantages of Green Manure)

हरी खाद के प्रयोग से निम्नलिखित लाभ होते हैं-

(1) हरी खाद के द्वारा पोषक तत्वों की निछालन द्वारा हानि कम होती है तथा ऊपरी तल पर पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि होती है।

(ii) कम खर्च में पर्याप्त खाद तैयार हो जाती है।

(iii) मृदा में जीवांश पदार्थ की वृद्धि होती है तथा पोषक तत्व अधिक स्थायी होता है।

(iv) भूमि की भौतिक दशा में सुधार होता है एवं भूमि की जल-धारण एवं वायु-संचार शक्ति में वृद्धि होती है।

(v) मृदा के लाभदायक जीवाणुओं की क्रियाशीलता में वृद्धि होती है।

(vi) फसलों की जड़ें भूमि में गहराई तक प्रवेश करके भूमि को खुला बनाती हैं।

(vii) यह विधि सस्ती है तथा इसे साधारण किसान भी प्रयोग में ला सकता है।

(viii) भू-क्षरण कम हो जाता है।

(ix) खरपतवारों के नियन्त्रण में सुविधा होती है।

(x) रासायनिक खादों के प्रयोग से उत्पन्न दोष कम हो जाते हैं।

प्रश्न 7 गोबर की खाद का रासायनिक संगठन बताइए

उत्तरगोबर की खाद का रासायनिक संघटन (Chemical Composition of F.Y. M.)- औसत रूप से अच्छी प्रकार सड़ी गोबर की खाद में भार की दृष्टि से ठोस भाग 75% तक पाया जाता है। ठोस भाग में फॉस्फोरस मुख्य रूप से पाया जाता है। नाइट्रोजन व पोटाश,ठोस-द्रव भाग में आधे-आधे पाये जाते हैं। खाद की रचना परिवर्तनशील होती है। खाद में 0.5 प्रतिशत नाइट्रोजन, 0.2 प्रतिशत फॉस्फोरस, 0.5 प्रतिशत पोटाश के अतिरिक्त अनेक दीर्घ एवं सूक्ष्म तत्व भी पाये जाते हैं।

प्रश्न 8 खाद एवं उर्वरक में अंतर लिखिये।

उत्तर- 


प्रश्न 9  वर्मी कम्पोस्ट के गुण लिखिये।

उत्तर – वर्मी कम्पोस्ट के भौतिक गुण (Physical properties of wormi compost)

(i) वर्मी कम्पोस्ट दानेदार गहरे भूरे काले रंग का मुलायम पदार्थ है।

(ii) यह बदबू रहित, खरपतवार रहित एवं हानिकारक जीवाणु रहित होता है।

(iii) इसके कणों पर म्यूकस जैसा पदार्थ चढ़ा रहता है।

(B) वर्मी कम्पोस्ट के रासायनिक गुण (Chemical properties of wormi compost)-

पी. एच.  : 7.7-7.5

कार्बन :  9.5-17.68 प्रतिशत

नाइट्रोजन :  1.0-1.5 प्रतिशत

फॉस्फोरस  :   0.5-1.0 प्रतिशत

पोटैशियम :  1-2-2.0 प्रतिशत

सोडियम. : 0.15-0-50 प्रतिशत

कॉपर. : 2.0-9.5 पी. पी. एम.

लोहा. : 2.0-9:3 पी. पी. एम.

जिंक. :. 5.7 – 11.5 पी. पी. एम.

सल्फर  :  128-548 पी. पी. एम.

Chepter ― 4 
उर्वरक

प्रश्न 1  उर्वरक किसे कहते हैं?

उत्तर – पादप पोषक प्रदान करने वाले वे रासायनिक पदार्थ जो कारखानों में बनाये जाते हैं और उपज बढ़ाने के लिए मृदा में प्रयोग किये जाते हैं, उर्वरक कहलाते हैं।”

प्रश्न2 – PSB का पूरा नाम लिखिये।

उत्तर – Bio-Fertilizers for Phosphatic Solubility or P.S.B.

प्रश्न 3 NPK का पूरा नाम क्या है।?

उत्तर –  नाइट्रोजन फास्पोरस  पोटेशियम

प्रश्न 4 टॉप ड्रेसिंग किसे कहते हैं?

 उत्तर- खड़ी फसल में उर्वरक छिड़कने को टॉप ड्रेसिंग कहते हैं।

प्रश्न 5 जैव उर्वरक किसे कहते हैं इसका महत्व लिखिए।

उत्तर-  जैविक क्रियाओं द्वारा तैयार उर्वरकों को जैविक उर्वरक कहते हैं इन्हीं तैयार करने में सूक्ष्म जीवों का योगदान होता है इनकी उपयोग से मृदा की उर्वरक क्षमता में वृद्धि होती है।

 महत्व – जैविक उर्वरक रासायनिक उर्वरकों की अपेक्षा सस्ती होते हैं तथा इनके प्रयोग से मिट्टी की संरचना तथा उसकी गुणवत्ता पर हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता तथा मिट्टी में लाभदायक सूक्ष्म जीवों की उपस्थिति भी बनी रहती है।

प्रश्न 6 राइजोबियम कल्चर क्या है? इसके लाभ लिखिए।

उत्तर-  राइजोबियम संवर्धन (कल्चर) (Rhizobium culture)-राइजोबियम का कल्चर व्यापारिक स्तर पर तैयार किया जाता है। भारत में इसका कल्चर यीस्ट सत्व मेनीटोल (Yeast Extract Mannitol, YEM) मीडियम (Medium) पर किया जाता है। इस मीडियम का संघटन निम्न प्रकार का होता है-

(1) यीस्ट सत्व (Yeastextract) = 1.0 ग्राम

(2) मेनीटोल (Mannitol) = 10.0 ग्राम

(3) पोटैशियम हाइड्रोजन फॉस्फेट (K2HPO4) = 0.5 ग्राम

(4) मैग्नीशियम सल्फेट (MgSO4) =0.2ग्राम

(5) सोडियम क्लोराइड (NaCl) = 0.1 ग्राम

(6) आसुत जल (Distilled water) = 1.0 लीटर

मीडियम pH =6-0 से 7.0 तक

राइजोबियम के प्रयोग से लाभ (Advantages of Rhizobium application)-

(1) दलहनी फसलों के उत्पादन में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है तथा उत्पादन में 15 से 25 प्रतिशत तक की वृद्धि होती है।

(2) मृदा की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है।

(3) एक वर्ष में लगभग 20-25 किग्रा. प्रति हेक्टेयर वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण

(4) राइजोबियम कुछ वृद्धि हॉर्मोन, जैसे-ऑक्सिन्स, जिब्रेलिन्स तथा साइटोकाइनिन्स भी बनाते हैं जिससे पौधों में अच्छी वृद्धि होती है।

(5) इसके प्रयोग से पर्यावरण, फसल तथा मृदा पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है।

(6) इसका प्रयोग अन्य रासायनिक उर्वरकों की अपेक्षा सुविधाजनक एवं सस्ता होता है।

(7) इसके प्रयोग से दलहनी फसलों की नाइट्रोजन की माँग को पूरा करने में मदद मिलती होता है।

प्रश्न 7 नील हरित शैवाल तथा इस मैटर पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर -( i.)  नील हरित शैवाल – नील हरित शैवाल को साइनोबैक्टीरिया भी कहा जाता है इनके द्वारा नाइट्रोजन का स्थिरीकरण एक विशिष्ट कोशिका पेट्रोल सिस्ट द्वारा किया जाता है। धान की फसल में नीचे वालों की 10 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर प्रयोग करने पर उपलक्ष में 20% की वृद्धि होती है धान के बाद उगाई जाने वाली फसलों में भी 7 से 14% वृद्धि पाई पाई गई है इनके प्रयोग से मृदा में जीवांश पदार्थ की वृद्धि होती है क्षारीय तथा अम्लीय मृदा में सुधार आता है साथ ही 20 से 40 किलोग्राम नाइट्रोजन का प्रति हेक्टेयर स्थिरीकरण होता है।

(ii) अजूबा एजोटोबेक्टर कृषि में अपने योगदान के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण और सर्वाधिक प्रचलित जीवाणु है यह फसलों में वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण के लिए जैविक उर्वरक के रूप में उपयोग किए जाते हैं इनके उपयोग से फसलों के उत्पादन में 10 से 15% तक की वृद्धि होती है इनसे तबकों की वृद्धि रुक जाती है तथा बीजों का अंकुरण बढ़ जाता है इनके द्वारा मृदा में 25 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर स्थिरीकृत होती है।

प्रश्न 8 उर्वरक कितने प्रकार के होते हैं ? पोषक तत्वों के आधार पर उर्वरकों का वर्गीकरण कीजिए।

उत्तर-  उर्वरक मुख्यता दो प्रकार के होते हैं रासायनिक उर्वरक तथा जैविक उर्वरक पोषक तत्व उपलब्धता के आधार पर उर्वरकों को तीन बार किया गया है

 (1) नाइट्रोजन (नत्रजन) युक्त उर्वरक (Nitrogenous Fertilizers)-इन उर्वरका ।

से पौधों को नाइट्रोजन प्राप्त होता है। इन्हें चार वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है-

• उर्वरक ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं, जिन्हें भूमि में पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों को प्रदान करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

(i) नाइट्रेट उर्वरक (Nitrate Fertilizers)-इन उर्वरकों में नाइट्रोजन, नाइट्रेट के रूप में उपस्थित रहती है, जैसे-सोडियम नाइट्रेट, पोटैशियम नाइट्रेट आदि।

(ii) अमोनिकल उर्वरक (Ammonical Fertilizers)-इन उर्वरकों में नाइट्रोजन अमोनिया के रूप में उपस्थित रहती है, जैसे-अमोनियम सल्फेट, अमोनियम क्लोराइड आदि ।

(iii) एमाइड उर्वरक (Amide Fertilizers)-इन उर्वरकों में नाइट्रोजन एमाइड के  रूप में उपस्थित रहती है, जैसे-यूरिया, कैल्शियम साइनामाइड आदि।

(iv) अमोनिकल एवं नाइट्रेट उर्वरक (Ammonical and Nitrate Fertilizers)-उर्वरकों में नाइट्रोजन, अमोनिया एवं नाइट्रेट दोनों रूपों में उपस्थित रहती है, जैसे-अमोनियम नाइट्रेट, कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट आदि।

(2) फास्फोरस (स्फुर) युक्त उर्वरक (Phosphatic Fertilizers)-इन उर्वरकों से पौधों को फास्फोरस प्राप्त होता है। इन उर्वरकों को उनकी घुलनशीलता के आधार पर निम्नलिखित । तीन प्रकार से विभाजित किया जाता है-

(1) जल में विलेय उर्वरक (Water Soluble Fertilizers)-इस वर्ग के फास्फोरस युक्त उर्वरक पानी में घुलनशील होते हैं, जैसे-सिंगल सुपर फॉस्फेट, डाई अमोनियम फॉस्फेट आदि।

(ii) सिट्रेट में विलेय उर्वरक (Citrate Soluble Fertilizers)-इस वर्ग के उर्वरकों में उपस्थित फॉस्फेट पानी में घुलनशील न होकर सिट्रिक अम्ल में घुलनशील होता है -जैसे-कैल्शियम फॉस्फेट, बेसिक स्लैग आदि।

(iii) पानी तथा सिट्रेट दोनों में अविलेय उर्वरक (Water and Citrate insoluble Fertilizers)-इस वर्ग के उर्वरक पानी तथा सिट्रेट दोनों में ही घुलनशील नहीं होते हैं, जैसे- रॉक, फॉस्फेट, हड्डी का चूरा आदि।

(3) पोटासयुक्त उर्वरक (Potassic Fertilizers)-इन उर्वरकों से पौधों को पोटाश की प्राप्ति होती है। इन्हें दो वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है-

(1) क्लोराइड के रूप में पोटैशियम प्रदान करने वाले उर्वरक, जैसे-म्यूरेट ऑफ पोट या पोटैशियम क्लोराइड।

(ii) क्लोराइड के अतिरिक्त अन्य रूप में पोटैशियम प्रदान करने वाले उर्वरक जैसे-पंटैशियम सल्फेट, पोटैशियम नाइट्रेट आदि।

(4) मिश्रित उर्वरक – दो या दो से अधिक उर्वरक पदार्थों को आपस में मिलाने से जो मिश्रण तैयार होता है, उसे मिश्रित उर्वरक अथवा उर्वरक मिश्रण (Mixed fertilizers) कहते हैं।

 प्रश्न 9 हड्डी का चूर्ण का रासायनिक संघटन लिखिए।

 उत्तर – हड्डी के चूर्ण में लगभग 3% नाइट्रोजन 24% फास्फोरस होता है।

प्रश्न  10 मृदा  मैं फास्फोरस की कमी का पौधों पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर – मृदा में फास्फोरस की कमी का पौधों पर प्रभाव –

(1) जड़ों का विकास कम होता है।

(2) तने कमजोर हो जाते हैं।

(3) फसल देर से पकती है।

(4) फूल एवं फल छोटे आकार के हो जाते हैं तथा कम बनते हैं।

(5) पत्तियों क रंग लाल-बैंगनी अथवा गहरे नीले रंग का हो जाता है।

Chepter ― 5 
पौध संरक्षण ― I

प्रश्न 1 पौध संरक्षण किसे कहते हैं ?

उत्तर –फसलों की सफल उत्पादन के लिए पौधों की खरपतवारओं ,कीटों एवं रोगों से रक्षा करना पौध संरक्षण कहलाता है।

प्रश्न 2 खरपतवार किसे कहते हैं?

 उत्तर–  खरपतवार ऐसे पौधे हैं जो वांछनीय अनुपयोगी प्राया जल्दी पकने वाले तथा स्थाई प्रतियोगी  कृषि कार्य में बाधा डालने वाले श्रम व खर्च को बढ़ाने वाले और पैदावार को घटाने वाले होते हैं।

प्रश्न3 खरपतवारों से होने वाली हानियों का वर्णन कीजिए

उत्तर– खरपतवारों से निम्न प्रकार की हानियाँ होती हैं-

(1) फसलों की उपज में कमी (Reduction in Crop Yields)-खरपतवार अधिक संख्या में उगकर फसल की अपेक्षा अधिक मात्रा में पोषक तत्वों का अवशोषण करते हैं तथा नमी, स्थान, वायु तथा प्रकाश के लिए फसलों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। परिणामस्वरूप फसलों की उपज में अत्यधिक कमी आ जाती है। 

(2) कृषि उत्पाद के मूल्य में कमी (Reduction in the Value of CropProducts)-खरपतवार के बीज मिले होने के कारण कृषि उत्पाद की गुणवत्ता घट जाती है, परिणामस्वरूप फसल की कीमत गिर जाती है। उदाहरण के लिए, विभिन्न फसलों के दानों में तेल व प्रोटीन की प्रतिशतता कम हो जाती है। गन्ने के पौधे में चीनी की प्रतिशतता कम हो जाती है। 

(3) कृषि लागत में वृद्धि (Increase in Production Cost)-खरपतवारों को हटाने के लिए  अतिरिक्त श्रम और औजारों की जरूरत पड़ती है और इन औजारों की खरीद पर अतिरिक्त धन व्यय करना पड़ता है। इन औजारों का खरपतवारों को नष्ट करने के अलावा कोई अन्य वैकल्पिक उपयोग नहीं होता है। 

(4) फसलों की जलमाँग में वृद्धि (Increase in Water Demand of Crops)- खरपतवार भूमि की नमी को ग्रहण कर लेते हैं, जिससे सिंचाई अधिक करनी पड़ती है और फसल को जल की पर्याप्त पूर्ति नहीं हो पाती।

(5) भूमि के मूल्य में कमी (Reduction in Land Value)-खरपतवारों को नष्ट करने में अधिक व्यय करना पड़ता है। अत: खरपतवारों से ग्रसित भूमि का बाजार मूल्य गिर जाता है।

(6) मनुष्यों पर हानिकारक प्रभाव (Harmful Effects on Human Beings)-खरपतवार द्वारा मनुष्यों की त्वचा में खाज-खुजली, चिड़चिड़ापन आदि रोग पैदा हो जाते हैं।

प्रश्न 4 खरपतवार उनसे होने वाले लाभ लिखिए।

उत्तर – खरपतवार ओं से निम्नलिखित लाभ होते हैं नंबर

 1. खरपतवार मृदा में पोषक तत्वों की वृद्धि करने में सहायक होते हैं ।

2.  खरपतवार मृतक चरण की रोकथाम करते हैं 4 खरपतवार ओं का उपयोग दवाइयों में किया जाता है।

 3. खरपतवार ओं का उपयोग चारों की चारी के रूप में भी किया जाता है । 

 4.  खरपतवार बंजर भूमि में सुधार लाने का कार्य करते हैं  । 7 . खरपतवार ओं का प्रयोग सजावट में भी किया जाता है । 8.  खरपतवार मृदा निर्माण में सहायक होती हैं तथा लाभदायक जीव जंतुओं को आश्रय देते हैं ।

 9. खरपतवार जैविक संतुलन को बनाए रखने में सहायक होते हैं। 

10. भूमि से वाष्पीकरण रोकने के लिए उपयोगी होते हैं, बांधों एवं खेतों की मेड़ों को कटने से रोकते हैं।

 11.  फसलों की नई प्रजातियां विकसित करने में अनुवांशिक पदार्थ के रूप में कार्य करते हैं।

प्रश्न5 – खरपतवार नियंत्रण की रासायनिक विधि की लाभ तथा हानि का उल्लेख कीजिए।

उत्तर – खरपतवार नियंत्रण की रासायनिक विधि के हानि-

(1) रसायनों का मृदा, जलवायु एवं स्वास्थ्य पर गलत प्रभाव पड़ता है।

(2) कुछ रसायन काफी महँगे होते हैं।

(3) किसानों में इन रसायनों के प्रयोग के तकनीकी ज्ञान का अभाव है।

(4) मिश्रित खेती में अलग-अलग प्रकार के रसायनों की आवश्यकता पड़ती है।

रासायनिक विधियों से लाभ (Advantages of chemical Measures)

(1) इस विधि द्वारा खरपतवारों को अंकुरण की अवस्था में ही नष्ट किया जा सकता है।

(2) काँटेदार खरपतवारों को इस विधि द्वारा नष्ट करना आसान है।

(3) इस विधि द्वारा ऊबड़-खाबड़ भूमियों, वृक्षों के नीचे उगे खरपतवारों पर छिड़काव आसानी से समाप्त किया जा सकता है।

(4) बहुवर्षी, काष्ठीय खरपतवारों को आसानी से नष्ट किया जा सकता है।

(5) इस विधि का उपयोग कतारों में बोई गई अथवा छिटककर बोई गई फसलों में आसानी से किया जा सकता है।

(6) इस विधि में उत्पादन व्यय कम होता है।

(7) अर्धशुष्क क्षेत्रों में खरपतवारों के द्वारा इस विधि द्वारा नियन्त्रण कर फसलों द्वारा पानी की नमी का उपयोग कर लिया जाता है।

Chepter ― 6
पौध संरक्षण ― II

प्रश्न 1. कीट नियंत्रण की भौतिक विधियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर – (1) हाथों द्वारा कीटों को एकत्र करना (Collection of Insects by Hands)-इस विधि में कीटों की विभिन्न अवस्थाओं को हाथों से पकड़कर नष्ट किया जाता है। यह विधि उन कीटों के लिए प्रयोग की जाती है जो कीट अपने अण्डे समूहों में रखते हैं या जो एक साथ एक स्थान पर खाते हैं तथा रहते हैं, जैसे-गन्ना बेधक, पाइरिला, गन्धीबग और हेयरी कैटरपिलर्स के अण्डों को आसानी से नष्ट किया जा सकता है।

(2) हस्त जालों द्वारा पकड़ना (Collection of Insects by Hand Nets)-उड़ने वाले कीटों को कपड़े के जालों द्वारा पकड़कर नष्ट किया जाता है। 

(3) खाई खोदना (Trenching)-विभिन्न प्रकार के लारवा या सुंडी या कूदने वाले कीटों से फसल को बचाने के लिए खेत के चारों ओर गहरी खाई खोदकर उसमें पानी भर देते हैं। तथा इसमें मिट्टी का तेल मिला देते हैं। कीट उसमें गिरकर पानी में डूबकर मर जाते हैं।

(4) बाड़ लगाना (Fencing)-रेंगने वाले कीटों को रोकने के लिए खेत के चारों ओर दीवारें बना देते हैं ताकि ये कीट एक खेत से दूसरे खेत में न जा सके।

(5) यान्त्रिक पाश (ट्रेप) (Mechanical Traps)-कीटों को नियन्त्रित एवं मारने के लिए कई प्रकार के पाश या प्रपंज (trap) काम में लाये जाते हैं-

(i) प्रकाश पाश (Light traps)-इसका प्रयोग उन स्थानों पर किया जाता है जहाँ पर कीट अधिक मात्रा में हों तथा वे कीट रात्रि के समय प्रकाश की ओर आकर्षित होने वाले हों। यह ,पाश अलग-अलग डिजाइनों के होते हैं। साधारण प्रकार के पाश में एक पेट्रोमैक्स को रात्रि में जलाकर एक चौड़े बर्तन में रखते हैं जिसमें मिट्टी का तेल मिला पानी भरा रहता है। इसको जब खेतों के पास रखते हैं तो कीट इसकी तरफ आकर्षित होकर आते हैं और बर्तन में गिरकर मर जाते हैं।0

(ii) चिपचिपे पाश (Stricker trap)-यह प्रायः फल वाले वृक्षों को कीटों से बचाने के लिए प्रयोग किये जाते हैं। चिपचिपे पदार्थों की पट्टी वृक्षों के चारों ओर पोत देते हैं। आम के वृक्षों के मीली बग (Mealy bug) को इस विधि से रोका जा सकता है।

(iii) चारा पाश (Fodder trapy-किसी भी बर्तन में चारे या सुगन्धित वस्तु को रखकर कीटों को आकर्षित करके मार दिया जाता है।

(6) सूर्य का उपचार (Light Treatment)-भण्डार-गहों से अनाज बाहर निकालकर इनकी नमी को धूप में कम करने से भण्डार गृह के अनेक कीट नष्ट या निष्क्रिय हो जाते हैं।

प्रश्न DDT क्या है?

उत्तर – ) डी. डी. टी. (D. D. T.)-इसका रासायनिक नाम डाइक्लोरो डाइफिनाइल ट्राइक्लोरोईथेन है। शुद्ध डी. डी. टी. सफेद क्रीम की तरह भुरभुरे चिकने पाउडर की तरह होती है। यह पानी में अघुलनशील (Suspension) परन्तु कार्बनिक यौगिकों में पूर्ण रूप से घुलनशील होती है। इस पर नमी, धूप, हवा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, इसलिए यह अन्य कीटनाशकों की अपेक्षा अधिक स्थायी होता है। यह तीव्र उदर एवं स्पर्श विष है। इसका कई रूपों में प्रयोग किया जाता है। बाजार में यह पाउडर, स्प्रे, तेल इमल्शन एवं तेल घोल के रूप में मिलती है। इसका प्रयोग सभी कीटों के विरुद्ध किया जाता है।

प्रश्न बीएचसी क्या है?  तथा इसका इस्तेमाल किस कार्य में किया जाता है?

उत्तर -बी. एच. सी. (Benzene levaloride) यह हर को पूरे रंग का भरभर पाउडर होता है। डी डी टी. की अपेक्षा यह कीटों को जल्दी मारता है क्योंकि इसके अन्दर धूम्रण का गुण भी होता है जिसके कारण यह कीटों के शरीर में शीध प्रवेश कर जाता है। परन्तु डी.डी.टी. की अपेक्षा इसका प्रभाव कम समय तक रहता है। इसको घर के  पानी में घोलकर या इमल्शन के रूप में प्रयोग करते हैं।

शुद्ध बी. एच. सी. में 90% गाया आइमोर होता है, उसे लिण्डेन कहते है। इसे बाजार कई व्यापारिक नामी, जैसे- गैमेक्सीन, हैक्सी डोल, बी. एच. सी. पिल्लहरीका, BHC माइक्रोसन, 66 हैक्साक्लोर आदि नामों से बेचा जाता है।

टिप्पणी लिखिये ―

1. तम्बाकू का मोजेक रोग

2. नींबू का सिट्रस केंकर रोग या खेरा रोग

3. मूंगफली का टिक्का रोग

उत्तर -( 1.) तम्बाकूका मोजेक रोग (Mosaic Disease ofTobacco)-ये तम्बाकू का एक सामान्य विषाणु रोग है। यह रोग तम्बाकू मोजेक विषाणु (Tobacco MosaicVirus, TMV) के संक्रमण से होता है। इस रोग में शीर्षस्थ तरुण पत्तियाँ अधोमुखी कुंचन तथा विरूपण (distortion) दर्शाती हैं। रोग की रोकथाम हेतु तम्बाकू एवं खरपतवारों के रोगग्रस्त पौधों को जड़ सहित उखाड़कर जला देना चाहिए। तम्बाकू की रोग प्रतिरोधी किस्मों को बोना चाहिए।

(2) सिट्रस कैंकर या नींबू का खैरा रोग (Canker Disease of Citrus) –  यह रोग नींबू जाति का विशेषकर कागजी नींबू का एक भयंकर रोग है। यह रोग जैन्थोमोनास सिट्री (Aanthomonas citri) नामक जीवाणु के संक्रमण द्वारा होता है। इस रोग के लक्षण जड़ को छोड़कर पौधे के सभी भागों पर दिखाई देते हैं। रोग के लक्षण पत्तियों की निचली सतह पर छोटे-छोटे गोल पनियाले (watery), पारभासक (Translucent) धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं। कई धब्बे मिलकर लम्बे विक्षत या कैंकर के रूप में पत्तियों, शाखाओं एवं फलों पर दिखाई देते हैं। इस रोग की रोकथाम हेतु प्रतिजैविक पदार्थ स्ट्रेप्टोमाइसिन अथवा फाइटोमाइसिन का एक निश्चित अन्तराल पर नींबू के पौधों पर छिड़काव करना चाहिए।

(3) मूंगफली का टिक्का रोग (Tikka Disease of Groundnut)-मूंगफली में यह रोग सरकोस्पोरा (Cercospora) की दो जातियों (1) स. परसोनेटा (C. personata) एवं सी. एरेकिडिकोला (C, arachidicola) द्वारा उत्पन्न होता है। इस रोग में पत्तियों के ऊपर भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं और अन्त में पत्तियाँ झड़ जाती हैं। इस रोग के फलस्वरूप मूंगफलियाँ छोटे आकार की बनती हैं। इस रोग की रोकथाम हेतु बीजों को बोने से पूर्व एग्रोसन (Agrosan GN) अथवा डाइथेन (Dithane M-22) से उपचारित करना चाहिए। फसल पर प्रत्येक पन्द्रहवें दिन बोर्डो मिश्रण का छिड़काव करते रहना चाहिए। 

प्रश्न  जैविक कीटनाशक तथा रासायनिक कीटनाशक में अंतर लिखिए।

प्रश्न नीम का बॉटनिकल नेम तथा उसके उपयोग लिखिए।

उत्तर – वानस्पतिक नाम (Botanical Name)-एजेडिरेक्टा इण्डिका (Azadirachta indica)

कुल (Family)-मेलिएसी (Meliaceae)

पीड़कनाशी उपयोग (Pesticidal Uses)-रासायनिक कीटनाशकों के कृषि, पर्यावरण एवं स्वास्थ्य विरोधी परिणामों को देखते हुए नीम एक सर्वोत्तम पीड़कनाशी कीटनाशक के रूप  में नीम की और भी कई विशेषताएँ हैं। जैसे-

(1) अन्य वृक्षों पौधों की अपेक्षा इसमें अल्प या शून्य मात्रा में विषाक्तता पाई जाती है जो गैर संक्रामक कीटाणुओं के लिए उपयोगी है।

(2) इसमें करीब 300 किस्म के प्रचलित कीटों को मारने या प्रतिबन्धित करने की क्षमता रखता है।

(3) यह एक सरल, सहज प्राप्य एवं रासायनिक कीटनाशकों की अपेक्षा सस्ता स्रोत है। इसे घरेलू स्तर पर भी तैयार किया जा सकता है।

(4) इसमें कीटों के लार्वा (डिम्भक) की रूपान्तरण प्रक्रिया को विखण्डित कर, नये रोगाणुओं को विकसित होने से रोकने, कीटों की प्रतिरोधी क्षमता का हास करने, कीटों को विकसित तथा उसके भरण को प्रतिबन्धित करने की जबरदस्त क्षमता है।

(6) फसलों, पौधों तथा भण्डारित अन्न को नष्ट करने वाले कीटों को नियन्त्रित करने में नीम अकेले सक्षम है।

(7) यह कीटों को ही खाने वाले कीटों, मनुष्यों एवं पशु-पक्षियों के प्रति हानिरहित है।

Chepter ― 7
फसलों की खेती का अध्ययन ― I

प्रश्न सोयाबीन की फसल का वर्णन निम्न बिंदुओं के आधार पर कीजिए बॉटनिकल नेम जलवायु तथा उन्नत किस्में।

उत्तर -वानस्पतिक नाम (Botanical name)

-ग्लाईसीन मैक्स (Glycine mar)

जलवायु (Climate)- यह खरीफ मौसम की फसल है। इसलिए इसके लिए कम तापक्रम और अधिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है। फलियों के पकते समय वर्षा नुकसानदायकआ  होती है।

उन्नत किस्में (Improved Varieties)-विभिन्न क्षेत्रों के लिए सोयाबीन की किस्में निम्नलिखित हैं-

1994 में विकसित उन्नत किस्में-NRC-2,1579-81,PK 1024, 1995 में विकसित उन्नत किसमें-VLS-21, KB-79,MAUS-2,PK-1029. 

1906 में विकसित उन्नत किस्में-PK 1042, NRC-7,NRC-12.

1999 में विकसित उन्नत किस्पै-159041, MACS-450.

2000 में विकसित उन्नत किस्में-प्रभावी सोना (MAUS-47), अहिल्या (NRC-37) इन्दिरा सोया-9, पन्त सोया-10921

प्रश्न मूंग की फसल का वर्णन निम्न बिंदुओं के आधार पर कीजिए वानस्पतिक नाम उन्नत किस्में जलवायु तथा बीज उपचार

उत्तर – वानस्पतिक नाम (Botanical name) -विग्ना रेडियेटा (Vigna radiata) )

कुल (Family)

-लेग्यूमिनेसी (Leguminacae)

जलवायु (Climate)-मूंग की खेती समुद्र तल से 2000 मीटर की ऊँचाई तक आसान से की जा सकती है। मैंग के लिए गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है। अधिक वर्षा इसक फसल के लिए हानिकारक है। ऐसे क्षेत्र जहाँ वर्षा 60-70 सेमी. हो, मूंग की खेती के लिए सही है फलियाँ आते समय और फलियों के पकते समय शुष्क मौसम एवं उच्च तापक्रम अच्छा है।

भूमि (Solly-मूंग की खेती सभी प्रकार की मृदा में सफलतापूर्वक की जा सकती है लेकिन अच्छे जल निकास वाली दोमट मृदा इसके लिए सर्वोत्तम रहती है। अम्लीय तथा क्षारीय भूमि इसके लिए उपयुक्त नहीं है।

उनत किस्में – 

(1) उत्तर प्रदेश के लिए स्नत किस्में-पी. एस. 10, पी. एस. 16, पी. डी.एम. 11, पूसा बैसाखी, मोहिनी,टा.44, पंत मूंग1, पंत मुंग2, पंत मूंग 3,11

(2) मध्य प्रदेश के लिए उनत किस्में-पी. डी. एम. 11, पी. एस. 16, जी. 65, के. 857, पूसा बैसाखी।

बीजोपचार (Seed Treatment)-बीज को बोने से पहले थीरम 3 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करके, राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए। ऐसा करने से मूंग की उपज में अधिक वृद्धि होती है।

Chepter ― 8 
फसलों की खेती का अध्यन ― II

प्रश्न गन्ने की फसल का वर्णन कीजिए।

उत्तर – वानस्पतिक नाम (BotanicalName):-

सैकरम ऑफिसिनेरम (Saccharum officinarum)

जलवायु (Climate)– गन्ना उष्ण कटिबन्धीय जलवायु का पौधा है। इसकी अच्छी वृद्धि के लिए अधिक तापमान, साधारण आर्द्रता तथा चमकीली धूप आवश्यक है। इसके अंकुरण एवं वृद्धि के लिए उपयुक्त तापमान 25-30°C है। इसकी अच्छी खेती के लिए औसतन वार्षिक वर्षा 200-225 सेमी. चाहिए। परिपक्व होते समय मौसम शुष्क, साफ (पाले रहित) तथा ठण्डा होना चाहिए।

भूमि (Soil)- गन्ना लगभग सभी प्रकार की भूमियों में हो जाता है परन्तु हल्की मटियार दोमट भूमि गन्ने की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है क्योंकि इस भूमि में नमी धारण करने तथा पोषक तत्वों को बनाये रखने की क्षमता अच्छी होती है। गन्ने की खेती के लिए भूमि में जल निकास की अच्छी सुविधाओं का होना बहुत जरूरी है। गन्ने के लिए भूमि की pH 6-1-7.7 के मध्य होनी चाहिए।

गन्ने की उन्नत किस्में – 

(i) अगेती किस्में-Cos 510, CoS 1336, CoJ64, CoLK 810, B047,B065

(ii) मध्य व पछेती किस्में-CoLK 8102, CoLK 8501, CoLK 91239,COS 7918,

Chepter ― 9
मशरूम की खेती

प्रश्न 1 मशरूम कितने प्रकार की होती है?

उत्तर – मशरूम्स को उनके आवास के आधार पर निम्नलिखित पाँच वर्ष में विभक्त किया जाता है-

(1) ताजे पादप अवशेषों में पायी जाने वाली जातियों-उदाहरण-लॉटनस (Ventine) ऑरीकुलेरिया (Auricularia), प्नुरोटस (Pleurous), ट्रेमीला (Tremella) आदि।

(2) अल्प कम्पोस्ट पादप अवशेषों में पायी जाने वाली जातियाँ-उदाहरण-कोणाहना (Coprinus), वाल्वेरियेला (Volveriella), स्ट्रोफिरिया (Stropharia) आदि।

(3) पूर्ण कम्पोस्ट पादप अवशेषों में पायी जाने वाली जातियाँ उदाहरण-एपरिहार(Agaricus)

(4) मिट्टी अथवा जीवांश पदार्थ (Humus) में लगने वाली जातियाँ- उदाहरण पोरन (Morchella), गायरीमित्रा (Gyromitra), लेपियोटा (Lepiota) आदि।

(5) कवकमूल (Mycorrhiza) मैं पायी जाने वाली जातियाँ- उदाहरण-ट्यूबर (Tuters, बोलीटम (Boletus), एमेनिटा (Amanita) आदि।

प्रश्न 2 मशरूम का महत्व लिखिए ।

उत्तर – मशरूम का पोषक महत्त्व (Nutritive Value of Mushrooms)

शुष्क भार के आधार पर विभिन्न मशरूम्स में प्रोटीन की मात्रा 21 से 30% तक होती है। इनकी प्रोटीन में लगभग सभी आवश्यक अमीनो अम्लों की मात्रा अण्डे की तुलना में अधिक होती है। इनमें उपस्थित विटामिन इनको पकाने, सुखाने अथवा डिब्बाबन्दी (Canning) से विकृत नहीं होते हैं। इनमें वसा बहुत कम मात्रा में होते हैं अत: मधुमेह एवं हृदय रोगियों के लिए प्रोटीन बहुल भोजन के रूप में प्रयोग होते हैं। मशरूम को प्राय: वनस्पति मांस (Vegetable meat) कहा जाता है।

प्रश्न 3 जहरीले मशरूम की पहचान कैसे करते हैं लक्षण लिखिए।

 उत्तर –निम्नलिखित लक्षण देखने को मिलते हैं-

(1) विषैले मशरूम को तोड़ने पर दूध जैसा स्राव होता है।

(2) विषैले मशरूम के साथ प्याज का व्यंजन बनाते समय प्याज का रंग असामान्य ही जाता है।

(3) विषैले मशरूम के व्यंजन में चाँदी की किसी वस्तु को डालने पर वह काली पड़ जाती है।

(4) विषैले मशरूम में कैप के किनारों पर धारियाँ होती हैं।

(5) विषैले मशरूम को जन्तु नहीं खाते हैं, अतः प्रकृति में वे जहाँ निकलते हैं वहीं नष्ट हो जाते हैं।

उदाहरण-कुछ विषैली जातियों के नाम इस प्रकार हैं-एमेनिटा मस्केरिया (Amanita muscaria), ए. वर्ना (A. verma), ए. फेलॉडस (A.phalloides), ए. वाइरोसा (A. virosay, ए. ब्रुनेसेन्स (A. brunnescens), गायरोमित्रा एस्कुलेण्टा (Gyromitra esculenta), 

प्रश्न 4 प्रतिद्वंदी कवक किसे कहते हैं?

उत्तर – प्रतिद्वन्द्वी कवक (Competitor fungus) मशरूम से हवा, पानी, जगह और पोषक तत्वों के लिए स्पर्धा करते हैं जिससे मशरूम की उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

उदाहरण-इन्क कैप्स (Ink caps), फाल्स ट्रफल (False Truffle), ग्रीन मोल्ड (Green mould), ब्राउन प्लास्टर मोल्ड (Brown Plaster mould) आदि।

Note –  दोस्तों आशा करते हैं आपको हमारी यह पोस्ट पसंद आई हो यह अवश्य आपकी परीक्षाओं के लिए सहायता प्रदान करेगी इसे अपने सभी दोस्तों में शेयर अवश्य करें जिससे कि सभी विद्यार्थियों की मदद हो सके और हमें कमेंट करके बताएं की आपको हमारी पोस्ट कैसी लगी।

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