क्लास 11th इतिहास सितंबर मासिक टेस्ट full Solution 2021 MP Board

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क्लास 11th इतिहास सितंबर मासिक टेस्ट पेपर full Solution 2021 MP Board

Class 11th history September masik test full Solution 2021 : दोस्तों आज हम क्लास 11th इतिहास सितंबर मासिक टेस्ट पेपर के लिए full Solution लेकर आए हैं यहां से आप September इतिहास masik test paper की तैयारी कर सकते हैं क्योंकि इस पोस्ट में हम सिर्फ वही क्वेश्चन लेकर आए हैं जो सितंबर मासिक टेस्ट मैं पूछे जा सकते हैं यह सभी क्वेश्चन September masik test syllabus के अनुसार निकाले गए हैं इनमें से ही क्लास 11th इतिहास सितंबर मासिक टेस्ट में क्वेश्चन पूछे जाएंगे तो आप यहां से तैयारी कर सकते हैं यहां पर आपको क्वेश्चन और उनके answer भी मिल जाएंगे।

Class-11th

 विषय- इतिहास

September masik Test full solution

अति लघुउत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-1.  पैगंबर मुहम्मद साहब का जन्म कब और किस स्थान पर हुआ था? 

उत्तर- इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगंबर मुहम्मद साहब का जन्म 570 ई. में अरब के प्रसिद्ध नगर मक्का में हुआ था।

प्रश्न-2. मुस्लिम पंचांग क्या है? यह किस वर्ष से प्रारंभ हुआ था ? –

उत्तर- मुस्लिम पंचांग का अर्थ है-मुहम्मद साहब का मदीना पहुँचना। हिजरी सन् की स्थापना उमर की खिलाफत के समय हुई थी। जिस वर्ष 622 ई. में मुहम्मद साहब मदीना पहुँचे उसी दिन से मुस्लिम पंचांग (हिजरी सन्) की शुरूआत हुई।

प्रश्न-3. इस्लाम के प्रथम चार खलीफाओं के नाम लिखिए। 

उत्तर- इस्लाम के प्रथम चार खलीफ़ा इस प्रकार थे-

1. अबू बकर (सन् 632-34 ई.) 

2. उमर (634-644 ई.)

3. उथमान (644-656 ई.),

4. अली या अली तालिब (656-661 ई.) ।

प्रश्न-4. उन चार क्षेत्रों के नाम बताइए जहाँ प्रारंभिक खलीफ़ाओं ने इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार किया।

उत्तर- प्रारंभिक खलीफाओं ने इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार निम्नलिखित चार क्षेत्रों में किया-

1. सीरिया

2.इराक

3. ईरान

4. बाइजेंटाइन साम्राज्य ।

प्रश्न-5. अबू बकर कौन थे?

उत्तर- अबू बकर इस्लाम के पहले खलीफ़ा थे और उनका शासनकाल सन् 632-34 ई. तक था।

 प्रश्न-6. अरब कबीलों के प्रधान (शेख) का चुनाव कैसे होता था?

उत्तर- अरब कबीलों के प्रधान (शेख) का चुनाव पारिवारिक संबंधों के आधार पर होता था। प्रधान के चुनाव में व्यक्तिगत साहस, बुद्धिमत्ता और उदारता (मुरव्वा) जैसे आदर्श को महत्त्व दिया जाता था।

प्रश्न-7.इस्लाम किन दो संप्रदायों में विभाजित हुआ? इसका कारण क्या था?

 उत्तर- खलीफ़ा अली द्वारा मक्का में अभिजात वर्ग के प्रतिनिधियों के विरुद्ध दो युद्ध लड़े गए। इससे मुसलमानों के मध्य दरार पड़ गई। परिणामतः इस्लाम धर्म दो संप्रदायों में विभाजित हो गया। ये संप्रदाय थे शिया और सुन्नी।

प्रश्न-8. उलमा कौन थे? उनके कार्यों की सूची बनाइए। 

उत्तर- उलमा धार्मिक विद्वान थे। उनके कार्य निम्नलिखित थे-

1. कुरान पर टीका लिखना।

2. पैगंबर मुहम्मद को प्रामाणिक उक्तियों और कार्यों को लेखबद्ध करना। 

३. कर्मकांडों के माध्यम से बाकी इंसानों के साथ मुसलमानों के संबंधों को नियंत्रित करना। इस कार्य के लिए कानून अथवा शरीया तैयार करना।

 प्रश्न-9. अरब कबीलों के विषय में आप क्या जानते हैं?

उत्तर- कबीले रक्त संबंधों पर संगठित समाज होते हैं। अरब कबीले वंशगत प्रणाली द्वारा निर्मित होते थे या बड़े परिवार के समूह होते थे। गैर-रिश्तेदार वंशों को गढ़े हुए वंशक्रम के आधार पर इस उम्मीद के साथ विलय किया जाता था कि नया कबीला शक्तिशाली होगा।

प्रश्न-10. इस्लाम धर्म में ब्याज पर निषेध क्यों था? क्या लोग इस निषेध का पालन करते थे?

उत्तर- इस्लाम धर्म के अंतर्गत व्याज की कमाई पर इसलिए निषेध था क्योंकि इस्लाम धर्म में ब्याज की कमाई खाना अल्लाह की नजरों में गुनाह माना जाता था। लोग इस निषेध का निःसंदेह अनुचित लाभ उठाते थे। उदाहरण के लिए, लोग एक विशेष प्रकार के सिक्कों में उधार लेकर अन्य प्रकार के सिक्कों में चुकाते थे। इसके अतिरिक्त वे मुद्रा विनिमय पर भी अपना हिस्सा प्राप्त करते थे। ये सभी क्रियाकलाप व्याज के ही रूप थे।

प्रश्न-11.  तुर्क कौन थे ? संक्षेप में समझाइए।

 उत्तर- तुर्क खानाबदोश लोग थे। वे तुर्किस्तान के मध्य एशियाई घास के मैदानों में रहते थे। वे कुशल घुड़सवार तथा योद्धा भी थे। संयोगवश वे अब्बासी, समानी और बुवाही साम्राज्यों के अधीन गुलामों और सैनिकों के रूप में नियुक्त किए जाते थे। किस्मत ने उनका साथ दिया और वे अपनी सैनिक योग्यता तथा वफादारी के दम पर उच्च पदों पर आसीन हुए। उनके द्वारा इस्लाम धर्म को अपनाया गया था।

प्रश्न-12. मुसलमानों और ईसाइयों में शत्रुता के दो मुख्य कारण क्या थे?

उत्तर- मुसलमानों और ईसाइयों के मध्य शत्रुता के दो मुख्य कारण निम्नलिखित थे-

 1. 1187 ई. में अरबों ने ईसाइयों के पवित्र स्थल जेरूसलम को जीत कर उसे एक मुस्लिम शहर बना दिया। बहुत से गिरिजाघरों को मस्जिदों में बदल दिया।

2. मुस्लिम राज्यों का अपने ईसाई प्रजाजनों की ओर कठोर रुख था।

प्रश्न-13. मुस्लिम भवन निर्माण कला की विभिन्न शैलियों का उल्लेख कीजिए। 

उत्तर- मुस्लिम भवन निर्माण कला की पाँच शैलियाँ निम्नलिखित थीं-

1. सीरियाई शैली, मिस्त्री अथवा अरबी शैली

2. मूर, स्पेनिश शैली

3. ईरानी शैली

4. भारतीय शैली

5. तुर्की शैली।

प्रश्न-14. धर्मयुद्ध या जेहाद किसे कहते हैं?

उत्तर- पोप अर्बन द्वितीय (Urban II) और बाइजेंटाइन सम्राट एलेक्सियस प्रथम (Alexius 1) ने 1095 से 1291 के मध्य पूर्वी भूमध्यसागर के तटवर्ती मैदानों में मुस्लिम शहरों के विरुद्ध धर्म के नाम पर मुसलमानों के साथ कई लड़ाइयाँ लड़ीं जिन्हें धर्मयुद्ध या जेहाद कहा गया।

प्रश्न-15.  यूरोप व एशिया पर धर्मयुद्धों के दो बुरे प्रभाव बताइए। 

उत्तर- 1. व्यापक स्तर पर जन व धन की हानि हुई।

 2. ईसाइयों की कमजोरी सिद्ध हुई और पोप के सम्मान में भी भारी क्षति आई।

                           लघुउत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-1. प्राच्यविद् से आप क्या समझते हैं? इस्लाम के अध्ययन में उनका क्या योगदान रहा है ?

उत्तर- अरबी और फ़ारसी के ज्ञान के लिए तथा मूल ग्रंथों के आलोचनात्मक विश्लेषण के लिए प्रसिद्ध विद्वानों को प्राच्यविद् कहा जाता है। इग्नाज गोल्डजिहर हंगरी का यहूदी था। उसने काहिरा के इस्लामी कॉलेज (अल-अजहर) में अध्ययन किया और जर्मन भाषा में इस्लामी कानूनों और धर्म विज्ञान के विषय में पथ-प्रदर्शक नयी पुस्तकों का लेखन कार्य किया। इस्लाम के 20वीं शताब्दी के इतिहासकारों ने अधिकतर प्राच्यविदों की रुचियों और उनके तरीकों का ही अनुसरण किया है।

प्रश्न-2.  इस्लाम धर्म में प्राणियों की मूर्ति बनाने या इनकी खुदाई की मनाही के बावजूद भी कलाकारों ने अपना जौहर दिखाया। कैसे?

उत्तर-इस्लामी धार्मिक कला में प्राणियों का चित्रण करना था इनकी खुदाई करने से मनाही है। इसलिए मस्जिदों के अंदर किसी प्रकार की मूर्तियाँ नहीं बनाई जाती थीं लेकिन इससे कलाकार अपनी सूक्ष्म कला का प्रदर्शन करने में किसी से पीछे नहीं रहे। उन्होंने रोशनदान टाइलों, कपड़ों पर कढ़ाई, लकड़ी और पत्थर पर जालियाँ बनाकर अपनी कला को प्रदर्शित किया। इस प्रकार अपने जौहर को जाहिर किया।

प्रश्न-3. हिजरा से आपका अभिप्राय क्या है?

उत्तर- मुहम्मद साहब को मक्का में समृद्ध लोगों के द्वारा भारी विरोध का सामना करना पड़ा। ये समृद्ध लोग देवी-देवताओं की उपेक्षा को बुरा मानते थे, उन्होंने इस्लाम धर्म को मक्का की प्रतिष्ठा और समृद्धि के लिए खतरा समझा था। परिणामतः सन् 622 में पैगंबर मुहम्मद को अपने अनुयायियों के साथ मदीना जाने के लिए विवश होना पड़ा। पैगंबर मुहम्मद की इसी यात्रा को इस्लामी इतिहास में हिजरा के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न-4. इस्लामी पंचांग की विशेषताओं को लिखें।

 उत्तर- इस्लामी पंचांग की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

1. हिजरी सन् की तारीख को जब अंग्रेज़ी में लिखा जाता है तो वर्ष के पश्चात् ए.एच. (AH) लगाया जाता है।

2. हिजरी वर्ष चंद्रवर्ष है। इसमें कुल 354 दिन और 29 या 30 दिनों के 12 महीने होते हैं l

3. हिजरी वर्ष में प्रत्येक दिन सूर्यास्त के समय से शुरू होता है और प्रत्येक महीना अर्धचंद्र के दिन से प्रारंभ होता है।

4. हिजरी वर्ष सौर वर्ष से 11 दिन कम होता है।

5. हिजरी का कोई भी धार्मिक त्यौहार जिनमें रमजान के रोजे, ईद और हज भी शामिल हैं,वे मौसम के अनुरूप नहीं होते हैं।

प्रश्न-5. जिन नए जीते गए राज्यों (क्षेत्रों) को इस्लामी राज्य में शामिल किया गया वहाँ के लोगों का प्रमुख व्यवसाय क्या था ?

उत्तर- इस्लामी राज्य में जिन नए जीते हुए राज्यों को (क्षेत्रों) शामिल किया गया वहाँ के लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। इस्लामी राज्यों ने इनमें कोई खास परिवर्तन नहीं किया। जमीन के मालिक छोटे-बड़े दोनों प्रकार के किसान थे। इराक़ और ईरान में जमीन बहुत बड़ी इकाइयों में विभाजित थी। ससानी और इस्लामी कालों में संपदा मालिक राज्य की ओर से कर एकत्र करते थे। जमीन गाँव की संयुक्त संपत्ति होती थी। जो भू-सम्पत्तियाँ इस्लामी विजय के बाद मालिकों द्वारा छोड़ दी जाती थीं, वे राज्य द्वारा अपने नियंत्रण में ले ली जाती थी। तदुपरांत साम्राज्य के विशिष्ट वर्ग के मुसलमानों अर्थात् खलीफ़ा के परिवार को ये भू-संपत्तियाँ दे दी जाती थीं।

 प्रश्न-6. शरीआ का कानूनी महत्त्व बताते हुए मध्यकालीन युग में शरीआ की स्थिति की चर्चा कीजिए।

उत्तर- शरीआ का कानूनी महत्त्व अत्यधिक था। यह सुन्नी समाज में सभी प्रकार के कानूनी विवादों के हल में मार्गदर्शन का काम करता था। निःसंदेह यह दांडिक और संवैधानिक विषयों के संबंध में कम प्रभावकारी था परन्तु व्यक्तिगत विषयों पर इसका प्रभाव अत्यधिक था। विशेषत: विवाह, तलाक और विरासत के प्रश्नों पर शरीआ का प्रभाव अत्यधिक स्पष्ट था।निःसंदेह शरीआ को रीति-रिवाजों और राज्य की कानूनी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता था लेकिन राज्य के देहाती क्षेत्रों में प्रचलित कानून अलग थे। ये कानून वहाँ के रीति-रिवाजों पर आधारित थे। इसके अतिरिक्त काजी प्रायः मामलों की मध्यस्थता से हल करने की कोशिश करता था। अतः कहा जा सकता है कि मध्यकालीन युग में शरीआ का पालन कठोरता से नहीं किया जाता था।

प्रश्न-7. इस्लाम धर्म के उदय से पूर्व अरब समाज की विशेषताओं की चर्चा कीजिए। 

उत्तर- इस्लाम धर्म के उदय से पूर्व अरब समाज की विशेषताएँ निम्न थीं –

1. अरब लोग कबीलों में विभक्त थे। प्रत्येक कबीले का नेता एक शेख हुआ करता था। 2. चुनाव कुछ हद तक पारिवारिक संबंधों के आधार पर किया जाता था परन्तु मुख्य रूप से वह व्यक्तिगत साहस, बुद्धिमत्ता और उदारता के आधार पर चुना जाता था। 3. प्रत्येक कबीले के अपने देवी-देवता होते थे। बुतों के रूप में मस्जिदों में इनकी पूजा की जाती थी। 4.अरब कबीलों में परस्पर अपने-अपने कबीलों के वर्चस्व को कायम रखने के लिए प्रायः झगड़े होते रहते थे। 5. अरब कबीलों का जीवन संघर्षशील और युद्धों में उलझा हुआ था।

प्रश्न-8. मुहम्मद साहब ने स्वयं को पैगंबर कब घोषित किया? इस्लाम की शिक्षाओं चर्चा कीजिए।

उत्तर- मुहम्मद साहब ने स्वयं को पैगंबर (रसूल) या खुदा का संदेशवाहक सन् 612 के आसपास घोषित किया। 

इस्लाम धर्म की शिक्षाएँ

1. केवल अल्लाह में विश्वास करना। 2. प्रतिदिन पाँच बार नमाज पढ़ना (अल्लाह से प्रार्थना करना) 13. निर्धनों को दान या खैरात देना। 4. रमजान के पवित्र महीने में रोजे रखना (व्रत) करना) 15. प्रत्येक मुसलमान को अपने जीवन में एक बार हज के लिए मक्का जाना (यदि वह जाने में समर्थ हो) 16. कुरान शरीफ़ को सबसे पवित्र मानना एवं उसे पाक-साफ रखना। 7. मूर्ति पूजा का खंडन। 8. मुसलमानों में प्रेम और भाईचारे की भावना को प्रोत्साहन देना । 9. जात-पाँत का खंडन करना। 10. माता-पिता तथा पड़ोसियों के साथ प्रेम से व्यवहार करना।

प्रश्न-9.’इस्लाम धर्म के उदय का अरब की राजनीतिक व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ा।’ इस कथन की चर्चा कीजिए।

उत्तर- सातवीं शताब्दी के दौरान अरब में इस्लाम का उदय एक युगांतकारी घटना थी। इस धर्म के उत्थान के पूर्व अरब निवासी अनेक छोटे-छोटे कबीलों में विभक्त थे। उनका जीवन निःसंदेह संघर्षशील था अर्थात् वे किसी-न-किसी बात को लेकर आपस में झगड़ते रहते थे लेकिन यह इस्लाम धर्म का ही श्रेय है जिसने इन निरंतर लड़ने-झगड़ने वाले कबीलों में राजनीतिक एकता उत्पन्न की और उन्हें राजनीतिक एकता का पाठ पढ़ाया। इससे ये कबीले संगठित जाति में बदल गए। फलस्वरूप विशाल साम्राज्य स्थापित हुआ। इस विशाल साम्राज्य में अरब देश के अलावा फ्रांस, मित्र, मध्य एशिया, उत्तर तथा पश्चिमी अफ्रीका, स्पेन और भारत के कुछ भाग भी सम्मिलित थे। इसके अतिरिक्त इस्लाम धर्म के प्रभाव में आने के परिणामस्वरूप अरब एक अनोखी सभ्यता को विकसित करने में सफल रहा। यह सभ्यता अपने समय में अनेक क्षेत्रों में संसार की श्रेष्ठ सभ्यता समझी जाती थी। निःसंदेह यह सब इस्लाम धर्म के उदय का तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था पर प्रभावी असर का ही नतीजा था।

प्रश्न-10.पवित्र पुस्तक कुरान शरीफ़ पर एक लघु निबंध लिखिए । 

उत्तर- ‘कुरान शरीफ़ ‘ अरबी भाषा में रचित पुस्तक 114 सूराओं (अध्यायों) में विभाजित है।और इसकी लंबाई क्रमिक रूप में घटती जाती है। इस प्रकार आखिरी सूरा सबसे छोटा है। पहला सूरा केवल एक अपवाद रूप में है जो संक्षिप्त प्रार्थना अर्थात् अल-फतिहा अथवा प्रारंभ से संबंधित है। मुस्लिम परंपरा के हिसाब से कुरान उन संदेशों (रहस्योद्घाटन) का संग्रह है, जिन्हें खुदा ने पैगंबर मुहम्मद को सन् 610 और 632 के मध्य की अवधि में पहले मक्का में और फिर मदीना में दिए थे। इन सभी रहस्योद्घाटनों को संकलित करने का काम किसी समय सन् 650 ई. में पूरा किया गया। आज का सबसे प्राचीन कुरान शरीफ़ नौवीं शताब्दी का है। इसके अतिरिक्त कुरान शरीफ़ के ऐसे बहुत से खंड हैं जो इससे भी अधिक प्राचीन हैं। ऐसे पदों को चट्टान की गुबंद और सातवीं शताब्दी के सिक्कों पर उत्कीर्ण किया गया था। कुरान शरीफ़ की खास बात यह है कि यह एक धर्मग्रंथ है। जिसमें धार्मिक सत्ता निहित है। अतः आमतौर पर मुसलमानों का विश्वास है कि खुदा की वाणी (कलाम अल्लाह) होने के कारण इसे शब्दश: समझा जाना चाहिए।

प्रश्न-11. राजकोषीय प्रणाली और बाजार के लेन-देन ने किस प्रकार इस्लामी देशों में धन के महत्त्व को बढ़ाने में मदद की?

उत्तर- राजकोषीय प्रणाली और बाज़ारों के लेन-देन ने इस्लामी देशों में धन के महत्व को काफी बढ़ा दिया। इसके लिए सोने, चाँदी और ताँबे (फुलस) के सिक्के बनाए जाते थे और वस्तुओं एवं सेवाओं के बदले सर्राफ़ों द्वारा सीलबंद किए गए थैलों में ये सिक्के भेजे जाते थे। प्रायः सोना अफ्रीका (सूडान) और चाँदी मध्य एशिया (जरफ़शन घाटी) से आती थी। कीमती धातुओं और सिक्कों का आयात यूरोप से भी होता था। इसे यूरोप पूर्वी व्यापारिक वस्तुओं को खरीदने के बदले अदा करता था। धन की बढ़ती हुई माँग ने लोगों को अपने द्वारा संचित भंडारों और बेकार प्रश्न इस्लामी इतिहास को पड़ी सम्पत्ति का उपयोग करने के लिए विवश कर दिया। उधार का कारोबार भी मुद्राओं के साथ जुड़ने से वाणिज्य गतिशील हो गया। मध्यकालीन आर्थिक जीवन में मुस्लिमों का योगदान यह है कि उन्होंने अदायगी और व्यापार व्यवस्था के लिए श्रेष्ठ तरीकों का विकास किया। उदाहरण के लिए साख-पत्रों (सक्क, जो अंग्रेजी शब्द चैक व हिंदी शब्द साख का मूल है) और हुंडियों (बिल ऑफ एक्सचेंज-सुफतजा) का इस्तेमाल व्यापारियों, साहूकारों द्वारा धन को एक स्थान से दूसरे स्थान और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित करने के लिए किया जाता था। वाणिज्यिक पत्रों के व्यापक इस्तेमाल से व्यापारियों को प्रत्येक स्थान पर नकद मुद्रा अपने साथ जाने से आजादी मिल गई। इसके परिणामस्वरूप उनकी यात्रा अधिक सुरक्षित हो गई। खलीफ़ा भी वेतन अदा करने व कवियों व चारणों को इनाम देने के लिए सिक्के का प्रयोग करते थे। 

प्रश्न -12. अरब साम्राज्य की भू-राजस्व व्यवस्था की चर्चा कीजिए। –                   

                        अथवा

इस्लामी राज्य में भूमि पर किसका सर्वोपरि नियंत्रण था? इस राज्य में प्रचलित कर प्रणाली का वर्णन कीजिए।

उत्तर- अरब साम्राज्य के लिए आय का प्रधान स्रोत कृषि भूमि थी। यही कारण था कि राज्य का कृषि भूमि पर सर्वोपरि नियंत्रण था। अरब साम्राज्य में खराज नामक विशेष ‘कर’ की व्यवस्था थी। वस्तुतः जीती गई भूमि जिन मालिकों के हाथों में रहती थी, उन्हें खराज अदा करनापड़ता था। इस कर की विशेषता यह थी कि यह कर खेती की स्थिति के अनुसार उत्पादन के आधे भाग से लेकर पाँचवें हिस्से के बराबर तक होता था। हम कह सकते हैं कि ऐसी भूमि पर जिसके स्वामी मुसलमान थे अथवा जिस पर उनके द्वारा खेती की जाती थी, उपज का दसवाँ हिस्सा कर के रूप में वसूला जाता था। इस कर व्यवस्था का प्रभाव यह पड़ा कि अनेक गैर-मुसलमान भारी कर से बचने के लिए मुसलमान बनना पसंद करने लगे। परिणामतः राज्य की आय में कमी आना स्वाभाविक था। इस समस्या से निपटने के लिए खलीफ़ाओं ने कुछ कारगर कदम उठाए। सबसे पहले उन्होंने धर्म परिवर्तन की रफ्तार को कम किया और कर की एक समान नीति अपनाई। इसके उपरांत 10वीं शताब्दी से प्रशासनिक अधिकारियों को उनका वेतन राजस्व के रूप में दिया जाने लगा। राजस्व के रूप में वेतन को इक्ता कहा जाता है।

प्रश्न-13.’अब्बासी क्रांति’ से आपका क्या तात्पर्य है?

उत्तर- सन् 750 में उमय्यद वंश की जगह अब्बासियों ने ले ली जो मक्का के निवासी थे। अब्बासियों ने उमय्यद शासन को दुष्ट बताया और यह पेशकश की कि वे पैगंबर मुहम्मद के मूल इस्लाम की पुनर्स्थापना करेंगे। एक ईरानी गुलाम अबू मुस्लिम ने अब्बासी सेना का नेतृत्व किया और उमय्यदों के अंतिम खलीफा मारवान को नदी पर हुई, लड़ाई में पराजित किया; इसे ही अब्बासी क्रांति कहा जाता है। इस क्रांति से न केवल वंश परिवर्तन हुआ बल्कि इस्लाम के राजनैतिक ढाँचे और उसकी संस्कृति में भी भारी परिवर्तन आए।

                     दीर्घउत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-1 इस्लामी इतिहास को जानने के विभिन्न स्रोतों की व्याख्या कीजिए। 

उत्तर- इस्लामी इतिहास को जानने के विभिन्न स्रोतों की व्याख्या निम्न प्रकार से की जा सकती है –

1. ऐतिहासिक एवं अर्द्ध-ऐतिहासिक कृतियाँ 600 ई. से 1200 ई. तक के इतिहास के पुनर्निर्माण हेतु सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साधन हैं। ऐतिहासिक कृतियों में इतिवृत्तों अर्थात् तवारीख़ का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके साथ ही इतिवृत्त अथवा तवारीख़ घटनाओं के कालक्रमानुसार विवरण है।

2. अर्द्ध ऐतिहासिक कृतियों में जीवनचरित (सिरा), पैगंबर के कथनों और कृत्यों के अभिलेख (हदीस) एवं कुरान की टीकाओं (तफ़सीर) की गणना की जाती है। इन कृतियों का निर्माण प्रत्यक्षदर्शी वृत्तांतों का बहुत बड़ा संग्रह था।

3. अन्य स्रोत में अरबी भाषा की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृति तबरी (निधन 923 ई. में) की तारीख है। इस ग्रंथ की महत्ता इस बात से सिद्ध होती है कि इसका अंग्रेजी में अनुवाद हो चुका है, जिसके 38 खंड हैं। निःसंदेह वर्तमान युग में इस ग्रंथ को बड़े चाव से पढ़ा जाता है।

4. अर्द्ध ऐतिहासिक कृतियों की खास विशेषता यह है कि इन कृतियों में कानूनी पुस्तकों, भूगोल, यात्रा-वृत्तांत, साहित्यिक रचनाओं; यथा-कहानियों और कविताओं आदि की गणना की जाती है। ये सभी पुस्तकें संबंधित काल में इस्लाम के उदय और प्रसार पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालती हैं।

5. पुरातात्त्विक स्रोतों के रूप में स्मारक और 7 भवन अभिलेख अथवा उत्कीर्ण लेख मुद्राओं आदि से भी तत्कालीन राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि विभिन्न दशाओं के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

प्रश्न-2. इस्लाम धर्म के शीघ्र प्रसार के प्रमुख कारण क्या थे? उनका उल्लेख की 

उत्तर- इस्लाम धर्म के शीघ्र प्रसार के कारण निम्न थे-

1. मुहम्मद साहब ने कहा कि जो मुसलमान धर्मयुद्ध में मारा जाता है वह सीधा जनत (स्वर्ग) में जाता है और जो व्यक्ति अन्य धर्मों पर विजय प्राप्त करता है वह धन-दौलत सांसारिक सखों की प्राप्ति करता है। इस कारण अनेक सैनिकों ने इस्लाम के प्रति श्रद्धा से स्वयं को बलिदान कर दिया।

2. दूसरे खलीफा उमर ने जीत हासिल करने पर प्राप्त वस्तुओं व धन को सैनिकों में बाँट देते की परम्परा शुरू की। इससे सैनिकों का खलीफ़ाओं व इस्लाम के प्रति विश्वास बढ़ने लगा जिससे इस्लाम धर्म के विस्तार को बल मिला।

3. इस्लाम के उदय के पूर्व रोम साम्राज्य कमजोर होकर टूट रहा था। छोटे-छोटे सरदारों ने अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिए थे। अरबों के जोश, उत्साह व विश्वास का सामना वे नहीं कर सके और पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात् अरबों ने इराक, ईरान, आरमीनिया, मिस्र, जेरूसलम, काबुल आदि को जीत लिया और वहाँ इस्लाम धर्म की स्थापना की।

4. इस्लाम धर्म में ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, जाति-पाँति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता था। गुलामों को भी सन्तान माना जाता था। भेदभाव से पीड़ित जनता ने इस्लाम धर्म को आसानी से स्वीकार कर लिया।

5. मुहम्मद साहब ने संपूर्ण विश्व में एक इस्लामी राज्य कायम करने का स्वप्न देखा और संसार को एकता में बाँधना चाहा। उनके अनुयायी ने पैगंबर मुहम्मद के नक्शेकदम पर चलकर उनके स्वप्न को पूरा करने का प्रयत्न किया। जब उन्हें जीत हासिल होती गई और अपार धनराशि मिलने लगी तो उनका उत्साह बढ़ने लगा। इससे इस्लामी राज्य के विस्तार के साथ-साथ इस्लाम धर्म के प्रसार प्रचार में सहायता मिली।

इस प्रकार इस्लामी राज्यों के विस्तार व इस्लाम धर्म के शीघ्र प्रसार के अनेक कारण देते हैं उसके प्रसार व प्रचार में सहयोग दिया।

प्रश्न-3. पैगंबर मुहम्मद साहब ने इस्लाम धर्म को किस प्रकार स्थापित किया?

 उत्तर- पैगंबर मुहम्मद ने लगभग सन् 612 में स्वयं को खुदा का संदेशवाहक (रसूल) घोषित कर दिया। उन्हें खुदा ने यह प्रचार करने के लिए आदेशित किया था कि केवल अल्लाह की ही इबादत अर्थात् पूजा की जानी चाहिए। इबादत के तरीके आसान थे; जैसे- दैनिक प्रार्थना (सलात), नैतिक सिद्धान्त, खैरात बाँटना, चोरी न करना। जिन लोगों ने मुहम्मद साहब के उसूलों व सिद्धान्तों को स्वीकार कर लिया, वे मुसलमान कहलाए। उन्हें कयामत के दिन मुक्ति और धरती पर रहते हुए सामाजिक संसाधनों में भागीदारी देने का भरोसा दिया जाता था। फिर भी मुसलमानों का विरोध मक्का के समृद्ध वर्गों द्वारा किया गया। सन् 622 में पैगंबर मुहम्मद अपने समर्थकों के साथ समृद्ध वर्ग के विरोध के फलस्वरूप मदीना जाने के लिए विवश हो गए। जिस वर्ष मुहम्मद साहब मदीना पहुँचे उसी वर्ष से मुस्लिम कैलेंडर अर्थात् हिजरी सन् का प्रादुर्भाव हुआ। हम जानते हैं कि किसी भी धर्म का अस्तित्व तब तक कायम है जब तक उसके प्रति लोगों में विश्वास व आस्था जिंदा है। मुहम्मद साहब ने अपने सिद्धान्तों द्वारा मक्कावासियों पर जीत हासिल कर ली और मदीना में भी अपना वर्चस्व यहूदियों के समक्ष बनाए रखा। तत्पश्चात् कालान्तर में एक धार्मिक प्रचारक और राजनैतिक नेता के रूप में काफी दूर-दूर तक ख्याति प्राप्त कर ली। पैगंबर मुहम्मद ने समुदाय की सदस्यता के लिए धर्मांतरण को एकमात्र कसौटी माना और उनका बल इसी बात पर अधिक रहा। मुहम्मद साहब की उपलब्धियों से प्रभावित होकर बहुत से कबीलों ज्यादातर बद्दूओं ने अपने धर्म को बदलकर इस्लाम को अपना लिया और उस समुदाय के सदस्य बन गए। इस प्रकार मुहम्मद साहब ने इस्लाम धर्म को स्थापित किया।

प्रश्न-4. उन परिस्थितियों का वर्णन कीजिए जिनके कारण धर्मयुद्ध (जेहाद) आरंभ

उत्तर- 1. यूरोप में ईसाइयों ने ग्यारहवीं, बारहवीं तथा तेरहवीं शताब्दियों में मुसलमानों के विरुद्ध अनेक लड़ाइयाँ लड़ीं। इसमें परस्पर पोप अर्बन और बाइजेंटाइन सम्राट एलेक्सियस प्रथम ने मिलकर मुस्लिम राज्यों के खिलाफ अनेक लड़ाइयाँ धर्म के नाम पर लड़ीं। इन लड़ाइयों को धर्मयुद्ध की संज्ञा दी गई है। इन धर्मयुद्धों का मुख्य प्रयोजन ईसाइयों की पवित्र भूमि जेरूसलम व फिलीस्तीन को मुस्लिम नियंत्रण से मुक्त कराना था। उन ईसाई सैनिकों को नाइट्स का नाम दिया गया जो मुसलमानों के विरुद्ध युद्ध में लड़े थे।

2. ग्यारहवीं सदी के अन्तिम भाग में मुहम्मद सलजुक तुर्कों ने पूर्व में सभी अरबों को पराजित किया। फिलीस्तीन में मुसलमानों ने तीर्थयात्रियों को ईसाई चर्चा तथा पवित्र स्थानों पर जाने से प्रतिबंध लगा दिया। तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया के ईसाइयों के क्षेत्रों पर कब्जा कर लेने की धमकी दी। पोप ने पश्चिमी देशों के ईसाइयों से मुसलमानों की इस धमकी का जवाब देने के लिए मदद माँगी। पोप ने अपनी अगुवाई में इस अवसर को ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए उचित समय माना।

3. सन् 1095 ई. में पोप द्वितीय ने यूरोपीय देशों के समक्ष एक भावुक व्याख्यान द्वारा ईश्वर से प्रार्थना की कि वे फिलीस्तीन से मुस्लिम लोगों को वहाँ से बाहर निकालने में उनकी मदद के लिए आगे आएँ। दो सौ वर्षों तक यूरोपीय ईसाइयों ने नाइट्स को मुसलमानों के खिलाफ़ युद्ध के प्रयोजन से आगे साम्राज्य विस्तार के लिए भेजा।

4. कुछ योद्धाओं ने अपने निजी स्वार्थों के वशीभूत होकर धर्मयुद्ध में स्वयं को शामिल किया। वे पूर्वी भूमियों से धन प्राप्त करने के लिए इस जेहाद से जुड़ गए। इटली के कुछ धनी वर्गों के लोगों ने इन धर्मयोद्धाओं की पूरी सहायता की ।

5. धार्मिक मतों के कारण बहुत से लोग धर्मयुद्ध में स्वतः सम्मिलित हुए। वे समझते थे कि यह एक धर्मयुद्ध है और इन धर्मयुद्धों में लड़ने से उन्हें उनके पापों से मुक्ति मिल जाएगी। अनेक जेहादियों ने ईसाई धर्म के प्रति अपनी भक्ति-भाव को प्रकट करने का इसे अच्छा साधन समझा और वे जेहाद के लिए बाहर आए।

प्रश्न-5 धर्मयुद्धों के परिणामों की व्याख्या कीजिए।

                          अथवा

यूरोप व एशिया पर धर्मयुद्धों का क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर- धर्मयुद्धों के धार्मिक परिणामों (प्रभावों) की अपेक्षा सांस्कृतिक, आर्थिक एवं सामाजिक परिणाम (प्रभाव) महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए। इन परिणामों (प्रभावों) की व्याख्या निम्नवत् की जा सकती है

 1. धर्मयुद्धों के परिणामस्वरूप ही यूरोप का एकाकीपन समाप्त हुआ और यूरोप एवं पूर्व के मध्य सीधा संपर्क स्थापित हुआ।

 2. धर्म के नाम पर युद्ध करने वाले व्यक्तियों का परिचय नए लोगों के साथ हुआ, फलतः उन्हें नए विचारों को ग्रहण करने का अवसर प्राप्त हुआ।

3. यूरोप और पूर्व के मध्य संपर्क का परिणाम यह हुआ कि यूरोपीय लोग तर्क पर आधारित पूर्व की सभ्यता-संस्कृति से अत्यधिक प्रभावित हुए। इसी काल में उन्हें प्लेटो और अरस्तू के दर्शन को पढ़ने का अवसर मिला और इससे उनकी ज्ञान पिपासा बढ़ी।

4. यह सत्य है कि धर्मयुद्धों ने यूरोप में पुनर्जागरण को साकार किया। इसके प्रभाव के कारण हुए व्यापारिक विकास ने व्यापारियों की समृद्धि में वृद्धि की पश्चिम और पूर्व में आपसी व्यापार में बढ़ोत्तरी व नए-नए पदार्थों का ज्ञान हुआ। यूरोपवासियों ने रेसम, कपास, चीनी, काँच के बर्तनों, गरम मसालों व दवाओं आदि से परिचय प्राप्त किया। धन के कारण बड़े-बड़े व्यापारी कला और साहित्य के पोषक बन गए। विद्वानों और कलाकारों को आश्रय दिया गया। परिमाणस्वरूप साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में नवीन विकास के लिए द्वार खुला।

5. इन धर्मयुद्धों का व्यापक प्रभाव चर्च पर भी पड़ा। इस प्रभाव के कारण चर्च के प्रभाव में भारी कमी आई। अंत में इस प्रभाव से सुरक्षा के लिए ही धर्म-सुधार आंदोलन का रास्ता अपनाया गया।

प्रश्न-5. सूफी समुदाय पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

                         अथवा

सूफी किन्हें कहा जाता था ? इस मत के सिद्धान्त क्या थे ?

उत्तर- मध्यकालीन इस्लाम के उदार धार्मिक विचारों वाले लोगों का एक ऐसा समूह उदित हुआ जिसे सूफ़ी समुदाय कहा जाता है। सूफ़ी सन्त रहस्यवाद के जरिए परमात्मा के विषय मेंअधिक व्यक्तिगत ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करते थे। सूफ़ी शब्द सफ़ा (पवित्रता) से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है-परमात्मा का अपना चहेता। ऐसे लोग परमात्मा को प्रिय हो जाते हैं जो सांसारिक कालुष्य से मुक्त हो जाते हैं।सूफ़ी लोग संसार के भौतिक पदार्थों और सुखों आदि का त्याग करने और केवल खुदा पर विश्वास करने की शिक्षा देते थे। सूफ़ी मत के मूल सिद्धान्त हजरत मुहम्मद साहिब की हदीस पर आधारित हैं। सूफ़ी संत कुरान को खुदा का आदेश मानते हैं। सूफ़ियों की धारणा है कि मनुष्य की आत्मा को उसके निर्माता अर्थात् परमात्मा के साथ मिलना चाहिए। ईश्वर से मिलन केवल तीव्रप्रेम (इश्क) द्वारा ही हो सकता है। बसरा की एक महिला संत राबिया ने इश्क का उपदेश अपनी एक शायरी के माध्यम से दिया। उसकी मृत्यु सन् 875 में हुई। एक ईरानी सूफ़ी बयाजिद बिस्तामी अपने आपको खुदा में फ़ना करने का उपदेश देने वाला पहला व्यक्ति था। सूफ़ियों का मानना है कि नाचने और गाने से मानव के दिल में प्यार की तरंगें पैदा होती हैं। फलतः अल्लाह से मिलन शीघ्र हो सकता है। सूफ़ी आनन्द उत्पन्न करने तथा प्रेम व भावावेश को उत्पन्न करने के लिए संगीत समारोहोंका आयोजन करते थे। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि सूफीवाद का द्वार सभी सम्प्रदायों के लिए खुला था चाहे वह किसी धर्म, हैसियत या लिंग का हो। भारत में सूफियों के कई सम्प्रदाय थे।उनमें से भारत में सर्वाधिक प्रसिद्ध सम्प्रदाय अजमेर में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती थे। 

प्रश्न-6. मुस्लिम सभ्यता व संस्कृति की विश्व को दी गई उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- अब्बासी खलीफ़ाओं के शासनकाल में मुसलमानों ने ज्ञान एवं विज्ञान के क्षेत्र में विशेष रुचि दिखाई। इस प्रकार अरब-सभ्यता एवं संस्कृति प्राचीन भारतीय, यूनानी व रोमन सभ्यताओं के आधार पर आगे बढ़ी। उन्होंने निम्न क्षेत्रों में अपना सराहनीय योगदान दिया –

1. मुस्लिम सभ्यता के अंतर्गत विज्ञान की दिशा में पर्याप्त प्रगति हुई। भौतिक एवं रासायनिक विज्ञान के अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन अरबों द्वारा किया गया। दूरबीन व दिशासूचक यंत्रों का आविष्कार इसी सभ्यता में हुआ। अरबों के द्वारा ही घड़ी के पेंडुलम का निर्माण किया गया।

2. मुस्लिम सभ्यता ने भारतीय संस्कृति से एक से नौ तक की संख्या और यूनानी संस्कृति से त्रिकोणमिति का ज्ञान प्राप्त कर इनके विकास में योगदान दिया। अल ख्वारिज्मी ने वर्ग समीकरणों व उमर खय्याम ने धन समीकरणों की रचना की।

3. अरबों ने वाणिज्य व व्यापार में काफी उन्नति की जिसके परिणामस्वरूप अरब में दमिश्क व बगदाद समृद्ध एवं सम्पन्न शहर बन गए। अरबों ने चीन, भारत, स्पेन, आदि देशों के साथ व्यापार किया।

4. मुस्लिम सभ्यता के दौरान कृषि के क्षेत्र में पर्याप्त उन्नति हुई। सिंचाई के उद्देश्य से मेसोपोटामिया में नगरों का जाल बिछाया गया और चावल, गन्ना, मक्का, रेशम, केला, नीबू, नारंगी व खरबूजा आदि की खेती शुरू की गई।

5. कला के क्षेत्र में मुस्लिम सभ्यता की देन उत्कृष्ट है। बगदाद, काहिरा व दमिश्क की मस्जिदों में उन्होंने अपनी अद्वितीय प्रतिभा का परिचय दिया। स्पेन में ग्रेनेडा नगर के एक महल के मेहराबों व झरोखों को देखकर लोग दाँतों तले उँगली दबा लेते हैं।

6. मुस्लिम सभ्यता के दौरान डाक-व्यवस्था सर्वप्रथम उन्होंने ही शुरू की।

       

                    यायावर साम्राज्य

                 अति लघुउत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-1 मंगोल कौन थे ?

उत्तर- मंगोल विभिन्न जनसमुदाय का एक निकाय था। ये लोग पूर्व में तातार,खितान एवं मंचू लोगों से और पश्चिम में तुर्की कबीलों से भाषागत समानता होने की वजह से आपस में जुड़े थे l

प्रश्न-2 मंगोल कबीलों का जीवन कैसा था?

उत्तर- मंगोल कबीलों का जीवन घुमक्कड़ था; इन्होंने कृषि व्यवस्था को नहीं अपनाया कारण शीत ऋतु में उनके द्वारा एकत्रित खाद्य सामग्री शीघ्र समाप्त हो जाती थी। इसके था अतिरिक्त वर्षा के अभाव में घास के मैदान भी सूख जाते थे। फलतः चरागाहों की तलाश में इन्हें अनवरत इधर-उधर भटकना पड़ता था।

प्रश्न-3 यायावरी इतिहास लेखन में इतिहासकारों को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है? किन्हीं दो कठिनाइयों का उल्लेख कीजिए।

 उत्तर- यायावरी इतिहास लेखन में इतिहासकारों को निम्नलिखित दो कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है

1. मंगोलों ने अपने बारे में स्वयं बहुत कम लिखा। विदेशी विद्वानों ने उनके विषय में ज्यादा लिखा।

2. ऐसी स्थिति में उन विदेशी मूल रचनाओं में जिन वाक्यों/कथनों का प्रयोग हुआ है, उनका मंगोल भाषा में करीबी अर्थ निकालना भी कठिन कार्य है। इसके अतिरिक्त बहुत से फ़ारसी तकनीकी शब्द मंगोल में प्रविष्ट कर गए हैं, जिनको समझकर सटीक अर्थ निकालना इतिहासकारों के लिए दुष्कर हो जाता है।

प्रश्न-4 मंगोलियन जनजातीय संस्कृति के विकास के उन तीन चरणों कीजिए जिनके आधार पर उसका अध्ययन किया जा सकता है।

उत्तर- मंगोलियन जनजाति संस्कृति के विकास का अध्ययन निम्नलिखित तीन चरणों में किया जा सकता है – 1. जनजाति कबीलों का आरंभिक काल (तुर्की एवं मंगोल कबीलों का परस्पर संघर्ष) |

२. एकीकृत मंत्रोच्चार साम्राज्य का काल ।

3. बुद्ध धर्म को अपनाना।

प्रश्न-5 बर्बर या बारबेरियन शब्द से आपका क्या आशय है?.

उत्तर- ‘बर्बर’ अंग्रेजी शब्द ‘बारबेरियन’ या यूनानी भाषा के बारबरोस (Barbaros) शब्द से उत्पन्न हुआ है। इसका तात्पर्य गैर-यूनानी लोगों से है। इनकी भाषा यूनानियों को बेतरतीब कोलाहल, ‘बर-बर’ के समान लगती थी। यूनानी ग्रंथों में बर्बरों को बच्चों के समान दिखाया गया है।

प्रश्न-6 चंगेज़ खान कौन था? उसके साम्राज्य के विषय में क्या कहा जा सकता है ?

उत्तर- चंगेज़ खान मंगोल साम्राज्य का संस्थापक था। उसके नेतृत्व में मंगोलों में अपनी पारंपरिक, सामाजिक और राजनीतिक रीति-रिवाजों को रूपांतरित करके एक भयानक सैनिक तंत्र और शासन संचालन की प्रभावी पद्धतियों का श्रीगणेश किया। उसका विजय रथ और उसके साम्राज्य को यूरोप और एशिया महाद्वीपों के अनेक भागों में फैला दिया।

                      लघुउत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-1 यायावर साम्राज्य से आपका क्या अभिप्राय है?

उत्तर- यायावर साम्राज्य की अवधारणा विरोधात्मक प्रतीत होती है। यायावर लोग मूलतः घुमक्कड़ थे। वे सापेक्षिक तौर पर एक अविभेदित आर्थिक जीवन और प्रारंभिक राजनीतिक संगठन के साथ परिवारों के समूहों में संगठित होते हैं। दूसरी ओर ‘साम्राज्य’ शब्द भौतिक अवस्थितियों को दर्शाता है। साम्राज्य’ ने जटिल सामाजिक और आर्थिक ढाँचे में स्थिरता प्रदान की और एक सुपरिष्कृत प्रशासनिक व्यवस्था के द्वारा एक व्यापक भूभागीय प्रदेश में सुचारू रूप से शासन प्रदान किया। चंगेज खान के नेतृत्व में तेरहवीं व चौदहवीं शताब्दी में पारमहाद्वीपीय साम्राज्य की स्थापना मध्य एशियाई मंगोलों ने की।

प्रश्न-2 मंगोलों से संबंधित इतिहास को हम किन-किन साधनों से ज्ञात कर सकते हैं? 

उत्तर- स्टेपी निवासियों अर्थात् मंगोलों ने सामान्य तौर पर अपना कोई साहित्य नहीं लिखा। इनसे संबंधित इतिहास का ज्ञान हमें मुख्यतः यात्रा-वृत्तांतों, इतिवृत्तों और नगरीय साहित्यकारों के दस्तावेजों से प्राप्त होता है। प्रायः इसमें यायावरों के जीवन से संबंधित सूचनाएं अज्ञात व पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं। मंगोलों की साम्राज्यिक सफलताओं ने अनेक विद्वान लेखकों के वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया। उनमें से कुछ ने अपने अनुभवों के आधार पर यात्रा-वृत्तांत लिखे। मंगोलों ने व्यापार के रास्तों और बाजारों को पुनर्स्थापित किया। फिर वेनिस के मार्कोपोलो की तरह अन्य यात्री भी आकृष्ट हुए। इन व्यक्तियों की पृष्ठभूमि भी अलग-अलग थी। ये इतिहासकार बौद्ध, कन्फ्यूशियसवादी, ईसाई, तुर्क और मुसलमान थे।

प्रश्न-3 ‘चंगेज़ खान द्वारा कायम राजनैतिक व्यवस्था अधिक स्थायी थी।’ कैसे? 

उत्तर- – मंगोल और तुर्कों को मिलाकर चंगेज़ खान ने एक परिसंघ बनाया। यह परिसंघ पाँचवीं शताब्दी के अट्टीला द्वारा बनाए गए परिसंघ के बराबर था। चंगेज़ की यह राजनैतिक व्यवस्था बहुत अधिक स्थायी थी। यही कारण था कि अपने संस्थापक की मृत्यु के बाद भी यह राजनैतिक व्यवस्था कायम रही। चंगेज़ खान की यह राजनैतिक व्यवस्था इतनी अधिक स्थायी थी कि चीन, ईरान और पूर्वी यूरोपीय देशों की उन्नत शस्त्रों से लैस विशाल सेनाओं का मुकाबला करने में भी सक्षम थी। परिणामस्वरूप कहा जा सकता है कि मंगोलों ने अपने विजित क्षेत्रों में  नियंत्रण स्थापित किया और इन क्षेत्रों पर बड़ी कुशलता से प्रशासन भी किया। यह चंगेज़ खान द्वारा कायम स्थायी राजनैतिक व्यवस्था का ही प्रमाण था।

प्रश्न-4 मंगोल साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारण कौन-कौन से थे? उनको सूचीबद्धकीजिए। 

उत्तर- मंगोल साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं

1. मंगोलों के पतन का मौलिक कारण यह था कि उनकी तादाद कम थी और वे अपनी द्वा प्रजा की अपेक्षा कम सभ्य थे।

2. मंगोलों ने अपने विजित क्षेत्रों में स्थायी रूप से बस जाने के बाद अपनी नयी प्रजा के साथ मेल-मिलाप नहीं बढ़ाया।

3. मंगोल साम्राज्य के पतन का एक प्रमुख कारण यह था कि मंगोलों ने स्वयं से अधिक सभ्य प्रजा की भाषा, धर्म और सभ्यताओं को अपनाकर अपना अलग अस्तित्व खो दिया।

 4. मंगोल साम्राज्य में राजवंशों के आपसी विरोधों और अपनी सभ्यता को विजित देशों को सभ्यता के साथ मिला देने के कारण भी मंगोल साम्राज्य का अंत हो गया।

 5. मंगोलों द्वारा अन्य धर्मों को अपनाया जाना भी मंगोल साम्राज्य के पतन का एक प्रमुख कारण है।

प्रश्न-5 मंगोलों के लिए व्यापार इतना महत्त्वपूर्ण क्यों था? 

                            अथवा

 यायावर कबीले चीन के साथ किन वस्तुओं का व्यापार किया करते थे?

उत्तर- मंगोलों के क्षेत्र स्टेपी क्षेत्रों में संसाधनों की कमी थी। इसी कारण मंगोलों और मध्य एशियाई यायावरों को व्यापार और वस्तु विनिमय के लिए उनके पड़ोसी चीनवासियों के पास जाना पड़ता था। यह व्यवस्था दोनों पक्षों के लिए लाभकारी थी। यायावर कबीलेवासी खेती से प्राप्त उत्पादों और लोहे के उपकरणों को चीन से लाते थे और घोड़े, फर व स्टेपी में पकड़े गएशिकार का विनिमय करते थे। उन्हें वाणिज्यिक क्रियाकलापों में काफी तनाव का सामना करना लो की तरह अन्य अत्यधिक ठंडा या गरम होने के कारण स्टेपी प्रदेशों में खेती करना केवल कुछ ही ऋतुओं में पड़ता था। इसका कारण यह था कि दोनों पक्ष अधिकाधिक लाभ कमाना चाहते थे। जलवायु के इतिहासकार बौद्ध संभव था। इसलिए खाद्य उत्पादों तथा लोहे के उपकरणों के लिए उन्हें चीन जाना पड़ता था। इस प्रकार मंगोलों का जीवन व्यापार के अभाव में असंभव था।

प्रश्न-6 यदि इतिहास नगरों में रहने वाले साहित्यकारों के लिखित विवरणों पर बनाया। यह परिसंघ निर्भर करता है तो यायावर समाजों के बारे में हमेशा प्रतिकूल विचार ही रखे जाएँगे। क्याआप इस कथन से सहमत हैं? क्या आप इसका कारण बताएँगे कि फारसी इतिवृत्तकारों नृत्यु के बाद भी यह ने मंगोल अभियानों में मारे गए लोगों की इतनी बढ़ा-चढ़ाकर संख्या क्यों बताई है? 

उत्तर- इस तथ्य में कोई संदेह नहीं है कि इतिहास लिखित तथ्यों पर भरोसा करता है।वह साक्ष्यों को पृष्ठभूमि पर ही लिखा जाता है। यदि नगरों में रहने वाले साहित्यकारों के लिखित पने विजित क्षेत्रों में विवरणों से इतिहास रचा गया हो तो यायावर समाजों के प्रति हमेशा प्रतिकूल विचार ही रखे ना यह चंगेज खान जाएँगे हाँ, मैं इस बात से सहमत हूँ कि कथन सही है। कारण यह है, फारसी इतिहासकारों ने मंगोल अभियानों में मारे गए लोगों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर बताई है, ताकि लोग अपने शासकों ? उनको सूचीबद्ध के प्रति वफादार बने रहें और इससे मंगोल शासक को कमजोर समझकर अन्य मंगोल उनके देश में न घुस आएँ। इसके साथ ही इतिहासकारों को मंगोलों का संरक्षण प्राप्त नहीं था।

इल खानी ईरान में तेरहवीं सदी के आखिरी दशक में फारसी इतिहासवृत्त में महान खानों थी और वे अपनी द्वारा की गई रक्तरंजित हत्याओं का विस्तृत वर्णन किया गया है और मृतकों की संख्या बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर व्यक्त की गई है। उदाहरण के लिए, इल खानी इतिहासवृत्त में यह विवरण अपनी नयी प्रजा के दिया गया है कि बुखारा के किले पर हुए आक्रमण में 3000 सैनिक हताहत हुए जबकि एक चश्मदीद गवाह ने इस विवरण के विरोध में लिखा है कि बुखारा के किले की रक्षा के लिए 400 ने स्वयं से अधिक सैनिक तैनात थे।

                     दीर्घउत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-1  मंगोलों की जनजातीय कबीलाई समाज की विशेषताएँ लिखिए। 

उत्तर- मंगोलों की जनजातीय कबीलाई समाज की विशेषताएँ निम्न थ

1. मंगोलों ने कृषि विज्ञान का विकास किया तथा पशुओं की एक जाति विकसित की। मंगोल; जानवरों के बाड़े, उनके लिए चारे का प्रबंध भी करते थे। 

2. वे ऐसी वस्तुएँ इकट्ठा करते थे जो टोपी बनाने के काम या बच्चों के बाल काटने के काम आती थीं।

3. मंगोलों ने विशिष्ट प्रकार के घर विकसित किए जिन्हें गैर (Ger) कहा जाता था। ऐसे काठ के बने हुए गेरों को एक घंटे में तोड़ा जा सकता था तथा दूसरे स्थान पर ले जाकर दो घंटे में ही पुनः जोड़ा जा सकता था।

4. मंगोलों ने ऐसा पंचांग तैयार किया जोकि जनजातियों की आवश्यकताओं के अनुकूल था। यह पंचांग इस प्रकार बनाया गया था जिसमें उनके जीवन के ढंग के अनुसार छुट्टियाँ थीं। 

5. मंगोलों ने युईगर लिपि तैयार की। यह लिपि मंगोलिन भाषा की प्राकृतिक भाषाओं से मिलती थी। वास्तव में, मंगोलों ने एक दर्जन लिपियों को अपनाया लेकिन यूईगर (Uighurs) की लिपि ही अस्तित्व में रही।

6. मंगोलों ने अपनी सभ्यता को सुरक्षित रखकर पड़ोसी देशों ईसाई रूस एवं कन्फ्यूशियस चाइना व मध्य एशियाई इस्लाम से अलग रखा। 

प्रश्न-2 कुबलई खान के जीवन तथा उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- कुबलाई खान तलूई का वंशज था। सन् 1260 ई. में महान खान रूप में कुबलाई खान सिंहासन पर बैठा। मंगोलों ने अपने इस नेता के नेतृत्व में अनेक विजय प्राप्त की। कुबलाई खान ने चीन में शुंग साम्राज्य पर विजय हासिल की और अपने शासनकाल में उसने चीन के दक्षिणी व उत्तरी भागों पर अपना कब्जा कर लिया। कुबलई खान ने अपनी राजधानी बीजिंग बनाई और यूआन वंश की नींव रखी। वस्तुतः मंगोलों ने रूस, चीन, मध्य एशिया तथा ईरान पर शासन किया। कुबलई खान देखने में तो सभी क्षेत्रों का शासक था, परंतु वास्तव में मंगोलों का साम्राज्य उस समय तक चार विभिन्न राज्यों में विभाजित हो चुका था। कुबलई खान एक योग्य शासक था। उसने चीन के पुराने सम्राटों के समान शासन किया। उसने चीन में सड़कों का निर्माण कराया। अकाल के दिनों में अनाज के भंडारण के लिए भंडारगृह बनाए तथा अनाथों एवं रोगियों को राज्य की ओर से पूरी सहायता दी। उसने पेकिंग (Peiking) में एक भव्य राजधानी बनाई और पेकिंग यंगज (Yangtz) से जोड़ने वाली बड़ी नहर (Grand canal) का शेष कार्य भी पूरा कराया। कुबलई खान ने चीन तथा अन्य देशों के साथ आपसी संबंधों में काफी सुधार किया। हमें मार्कोपोलो द्वारा लिखित पुस्तक ‘ट्रेवल्स ऑफ मार्कोपोलो’ में दिए गए मंगोल-चीन के जीवन वृत्तांत से कुबलई खान के शासन तथा साम्राज्य के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। मार्कोपोलो ने अपने दो चाचाओं के साथ वेनिस से लेकर कुबलई खान के दरबार तक की यात्रा की। उसकी यह यात्रा मध्य एशिया से लेकर भयानक गोबी के पठार तक चार वर्षों तक चलती रही।1275 ई. में कुबलई खान ने अपने दरबार में मार्कोपोलो का भव्य स्वागत किया। मार्कोपोलो कुबलई ख़ान द्वारा स्थापित सरकार में सत्रह वर्ष तक वफादार अधिकारी के रूप में कार्य करता रहा | कुबलई खान ने चीन, गोबी के मरुस्थल तथा मध्य एवं पश्चिमी एशिया के समतल भाग पर शासन किया। उन्होंने बहुत से यात्रियों तथा व्यापारिक काफिलों को सुरक्षा प्रदान की जोकि विश्व के पूर्व तथा पश्चिम में व्यापार के लिए यात्राएँ करते रहते थे। परिणामतः विश्व व्यापार के क्षेत्र में रेशम मार्ग (Silk Route) का महत्त्व बढ़ गया। मंगोल के चीन पर शासन के एक शताब्दी के काल में समय-समय पर आक्रमणों का सामना करने पर भी उनकी सभ्यता को कम हानि हुई। वास्तव में, वे कई क्षेत्रों में शिखर पर भी पहुँच चुके थे। 1259 ई. में जब कुबलई खान ने चीन पर अपना पूरा अधिकार कर लिया तो वह चीन की सभ्यता का महान प्रशंसक बन गया। हम कह सकते हैं कि चीन में कुबलई खान का शासन काल उपलब्धियों से पूर्ण रहा।

प्रश्न-3 चंगेज़ खान के जीवन और उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए। 

उत्तर- चंगेज़ खान का जन्म 1162 ई. के आसपास आधुनिक मंगोलिया के उत्तरी भाग में ओनोन नदी के निकट हुआ था। उसका आरंभिक नाम तेमुजिन था। उसके पिता का नाम येसूजेई (Yesugei) था जो कियात कबीले का मुखिया था। यह परिवारों का एक समूह था और बोरजिगिद (Borjigid) कुल से संबंधित था। उसके पिता की अल्पायु में ही हत्या कर दी गई थी और उसकी माता ओलुन-इके ने (Oelun-cke) तेमुजिन और उसके सगे व सौतेले भाइयों का पालन-पोषण बड़ी कठिनाई से किया था। 1170 के दशक में तेमुजिन को अपहरण करके दास बना लिया गया और उसकी पत्नी बोरटे (Borte) का भी विवाह के पश्चात् अपहरण कर लिया गया। अपनी पत्नी को छुड़ाने के लिए उसे लड़ाई लड़नी पड़ी। 

उपलब्धियाँ- चंगेज खाँ के बारे में साधारणतः यह समझा जाता है कि वह ऐसा व्यक्ति था जिसने नगरों को बर्बाद किया और लाखों निर्दोष व्यक्तियों का नरसंहार किया। परन्तु मंगोल चंगेज खाँ को देश के इतिहास में अपना सबसे अधिक महान नेता समझते थे जिसने कि मंगोलों को एकता प्रदान की जिसने कबीलों के आपसी युद्धों का अन्त किया और चीनियों द्वारा मंगोलों के शोषण का अन्त किया। उसने मंगोलों को समृद्ध बनाया, एक बहुत बड़ा साम्राज्य स्थापित किया तथा व्यापारिक मार्गों और व्यापारिक केन्द्रों को फिर से खोल दिया। मार्कोपोलो जैसे दूर से आने वाले यात्री भी उसकी इन उपलब्धियों से प्रभावित हुए।

प्रश्न-4 मंगोल इतिहास को समझने में उत्पन्न कठिनाइयों की चर्चा कीजिए।

 उत्तर- मंगोलियाई पारमहाद्वीपीय साम्राज्य के विस्तार के अध्ययन की स्रोत सामग्री विद्वानों के पास उपलब्ध कृतियाँ हैं। ये अनेक भाषाओं में रचित हैं। इनमें सबसे अधिक निर्णायक स्रोत चीनी, मंगोली, फ़ारसी और अरबी भाषा में उपलब्ध हैं लेकिन महत्त्वपूर्ण सामग्रियाँ हमें इतालवी, लैटिन, फ्रांसीसी और रूसी भाषा में मिलती हैं। प्रायः एक ही मूलग्रंथ दो अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग तरह से प्रस्तुत किए गए हैं। उदाहरणस्वरूप, चंगेज़ खान के विषय में सबसे प्राचीन विवरण ‘मंगकोल-उन-न्यूतोबिअन’ (Mangqol-un-niueatobea’an) मंगोलों के गोपनीय इतिहास में दिया गया है, किंतु वे एक-दूसरे के प्रतिक्रियावादी हैं। इसी प्रकार मार्कोपोलो मंगोल राजदरबार का यात्रा-वृत्तांत जोकि इतालवी व लैटिन भाषा में उपलब्ध है वे एकदूसरे से मेल नहीं खाते। यद्यपि मंगोलों ने अपने बारे में स्वयं बहुत कम साहित्य रचा तथापि उनके विषय में विदेशी सांस्कृतिक वातावरण में निवास करने वाले लोगों ने ज्यादा लिखा है। ईगोर दे रखेविल्ट्स (Igor de Rachewiltz) द्वारा लिखित मंगोलों का गोपनीय इतिहास और गेरहार्ड डोरफर (Gerhard Doesrfer) ने ऐसी मंगोल व तुर्की शब्दावलियों पर काम किया जो फ़ारसी में शामिल हो गईं। इन विद्वानों की कृतियाँ मध्य एशिया के यायावरों के इतिहास को पढ़ने में कठिनाइयाँ उजागर करती हैं। विदेशी इतिहासकारों के अनुसार, मंगोल भाषा के वाक्यांशों के सटीक या करोबी अर्थ प्रस्तुत करने में वाङ्गमीमांसक (philologist) की भूमिका अदा करनी पड़ती है।

प्रश्न-5  चंगेज़ खान की विजय उपलब्धियों की चर्चा कीजिए।

उत्तर- चंगेज खान चीन पर विजय प्राप्त करना चाहता था। उसने 1209 ई. में सी-सिआ लोगों को पराजित किया, जो उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में तिब्बती मूल के शासक थे। फिर उसने 1213 ई. में चीन की महान दीवार पर अतिक्रमण किया और 1215 ई. में पेकिंग नगर को लूटा। निःसंदेह मंगोल चिन वंश के शासकों के साथ लंबी लड़ाइयों में उलझे रहे। इसके अतिरिक्त 1218 ई. में मंगोलों ने करा खिता (Qara Khita) को पराजित किया। इस प्रकार मंगोल साम्राज्य का विस्तार अमू दरिया, तुरान तथा ख्वारजम राज्यों तक फैल गया। ख्वारज़म का सुल्तान मोहम्मद मंगोल दूतों का वध करने के कारण चंगेज़ खाँ के प्रचंड कोप का भाजक बना। चंगेज़ खान ने 1219-21 ई. तक के अभियानों में ओट्रार, बुखारा, समरकंद, बल्ख, गुरगंज, मर्व, निशापुर और हेरात जैसे सुप्रसिद्ध विशाल नगरों को आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया। प्रतिरोध करने वाले नगरों को भयंकर विनाश का सामना करना पड़ा। उदाहरण के लिए, निशापुर के घेराबंदी के समय जब एक मंगोल राजकुमार की हत्या कर दी गई तो चंगेज़ खान द्वारा शहर को विध्वंश कर देने का आदेश दिया गया। इसके साथ सुल्तान मोहम्मद का पीछा करती हुई मंगोल सेनाएँ अजरबैजान तक पहुँच गईं। क्रीमिया में रूसी सेनाओं को परास्त करके कैस्पियन सागर को घेर लिया था। एक मंगोल सैन्य टुकड़ी सुल्तान के पुत्र जलालुद्दीन का पीछा करते हुए अफगानिस्तान एवं सिंध प्रदेश तक पहुँच गई थी। 

प्रश्न-6  चंगेज़ खान ने अपनी अपूर्व बुद्धिमत्ता तथा अद्भुत संगठन प्रतिभा का परिचय किस प्रकार दिया?

                         अथवा

चंगेज़ खान की सैनिक उपलब्धियों की चर्चा कीजिए।                          

                          अथवा

मंगोलों की सफलता के प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए। 

उत्तर- चंगेज खान ने अपने जीवन का अधिकांश भाग युद्धों में व्यतीत किया। निःसंदे उसकी सैनिक उपलब्धियाँ आश्चर्यजनक थीं। चंगेज खान ने अपनी अपूर्व बुद्धिमत्ता तथा अद्भुत संगठन प्रतिभा का परिचय देते हुए पशुपालक एवं शिकार-संग्राहक कबीले को कुशल सैनिकों में बदल दिया। उसकी सैनिक उपलब्धियाँ मंगोलों की सफलता के प्रमुख कारण निम्न हैं-

1. चंगेज़ खान ने स्टेपी-क्षेत्र की युद्ध शैली में आवश्यकतानुसार अनेक परिवर्तन एवं सुधार किए। परिणामतः मंगोलों की रणनीति एक प्रभावशाली रणनीति बन गई।

2. चंगेज खान ने अपनी घुड़सवार सेना में मंगोलों और तुर्कों दोनों को सम्मिलित किया। इसका कारण यह था कि मंगोल और तुर्क दोनों ही कुशल घुड़सवार थे। इनके घुड़सवारी कौशल ने उसकी सेना को अत्यधिक गतिमान बना दिया।

3. मंगोल अपने अभियान शीत ऋतु में प्रारंभ करते थे। वे शत्रु के शिविरों और नगरों में प्रवेश करने के लिए बर्फ़ से जमी हुई नदियों का प्रयोग राजमार्गों की तरह करते थे।  

4. चंगेज़ खान को पता था कि घेराबंदी-यंत्र और नेफ्था बमबारी के अभाव में प्राचीरों से आरक्षित किलों पर विजय प्राप्त करना दुष्कर था। अतः उसने अपनी सैन्य टुकड़ियों को इनके प्रयोग में कुशल बनाने का प्रयास किया।

5. चंगेज खान के इंजीनियरों द्वारा निर्मित हलके चल-उपस्करों जो युद्ध के लिए घातक थे। ने उसके सैन्य अभियानों की सफलता में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। अतः कहा जा सकता है कि उसकी सैनिक सफलता सराहनीय थी।

प्रश्न-7 चंगेज खान ने यह क्यों अनुभव किया कि मंगोल कबीलों को नवीन सामाजिक और सैनिक इकाइयों में विभक्त करने की आवश्यकता है? 

उत्तर- चंगेज खान उन विभिन्न जनजातीय समूहों, जो उसके महासंघ के सदस्य थे, उनकी पहचान को योजनाबद्ध रूप से मिटाने को कृतसंकल्प था। उसकी सेना स्टेपी-क्षेत्रों की. और पुरानी दशमलव प्रणाली के अनुसार गठित की गई थी। यह दस, सौ हजार और दस हजार वाले सैनिकों की इकाई में विभक्त थी। पुरानी प्रणाली में कुल (clan), कबीले (tribe) और सैनिक दशमलव इकाइयाँ एक साथ कायम थीं। चंगेज खान ने इस प्रथा को समाप्त किया। उसने प्राचीन जनजातीय समूहों को विभाजित कर उनके सदस्यों को नवीन सैनिक इकाइयों में संगठित कर सिनाएँ दिया। सैनिकों की सबसे बड़ी इकाई लगभग दस हजार सैनिकों, जिसे ‘तुमन’ कहा जाता था, की घेर थी, जिसमें विभिन्न कबीलों व कुलों के सदस्य शामिल होते थे। इसके साथ-साथ चंगेज खान ने स्टेपी क्षेत्र की पुरानी सामाजिक व्यवस्था को भी बदल दिया और विभिन्न वंशों और कुलों को एकत्रित कर इन सभी को एक नयी पहचान दी। चंगेज खान ने मंगोलियाई कबीलों को नवीन सामाजिक व सैन्य इकाइयों में विभक्त कर दिया। इसका कारण यह था कि उसे यह संदेह था कि कहीं ये सभी लोग संगठित होकर उसकी सत्ता न पलट दें और अपने-अपने साम्राज्य स्थापित न कर लें l यही कारण था कि चंगेज खान को ऐसा अनुभव हुआ कि मंगोल कबीलों को नवीन सामाजिक और सैनिक इकाइयों में विभक्त किया जाए।

 

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